भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished301 पृष्ठ

पृष्ठ 23, कुल 301 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 23

शां० भा० ] आगम-प्रकरण ३


सम्बन्धभाष्य

[अनुबन्ध-विमर्शः]
ओमित्येतदक्षरमिदं सर्वम् ।<br>तस्योपव्याख्यानं<br>वेदान्तार्थसारसंग्रह-<br>भूतमिदं प्रकरण-<br>चतुष्टयमोमित्येतदक्षरमित्याद्या-<br>रभ्यते । अत एव न पृथक्सम्बन्धा-<br>भिधेयप्रयोजनानि वक्तव्यानि ।<br>यान्येव तु वेदान्ते सम्बन्धाभि-<br>धेयप्रयोजनानि तान्येवेह भवितु-<br>मर्हन्ति । तथापि प्रकरणव्या-<br>चिख्यासुना संक्षेपतो वक्तव्यानि।‘ॐ’ यह अक्षर ही यह सब कुछ है। उसका व्याख्यानरूप तथा वेदान्तार्थका सारसंग्रहभूत यह चार प्रकरणोंवाला ग्रन्थ ‘ओमित्येतदक्षर-मिदम्’ आदि मन्त्रद्वारा आरम्भ किया जाता है। इसीलिये इसके सम्बन्ध, विषय और प्रयोजनका पृथक् वर्णन करनेकी आवश्यकता नहीं है । वेदान्तशास्त्रमें जो-जो सम्बन्ध, विषय और प्रयोजन हुआ करते हैं वे ही इस ग्रन्थमें भी हो सकते हैं। तो भी [ व्याख्याकार ऐसा मानते हैं कि ] जिन्हें किसी प्रकरण-ग्रन्थकी व्याख्या करनेकी इच्छा हो उन्हें संक्षेपसे उनका वर्णन कर ही देना चाहिये ।
तत्र प्रयोजनवत्साधनाभि-<br>व्यञ्जकत्वेनाभिधेयसम्बद्धं शास्त्रं<br>पारम्पर्येण विशिष्टसम्बन्धाभिधेय-<br>प्रयोजनवद्भवति । किं पुनस्त-<br>त्प्रयोजनमित्युच्यते, रोगा-<br>र्तस्येव रोगनिवृत्तौ स्वस्थता ।<br>तथा दुःखात्मकस्यात्मनो द्वैत-तहाँ, प्रयोजनसिद्धिके अनुकूल साधन अभिव्यक्त करनेके कारण अपने प्रतिपाद्य विषयसे सम्बन्ध रखनेवाला शास्त्र परम्परासे विशिष्ट सम्बन्ध, विषय और प्रयोजनवाला हुआ करता है। अच्छा तो, [ इस शास्त्रका ] वह क्या प्रयोजन है ? सो बतलाया जाता है—जिस प्रकार रोगी पुरुषको रोगकी निवृत्ति होनेपर स्वस्थता होती है उसी प्रकार दुःखाभिमानी आत्माको द्वैत-