भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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शां० भा० ] अversion/अलातशान्तिप्रकरण २१९


नास्त्यसद्धेतुकमसच्छश-<br>विषाणादि हेतुः कारणं यस्यासत<br>एव खकुसुमादेस्तदसद्धेतुकमसन्न<br>विद्यते । तथा सदपि घटादि-<br>वस्तु असद्धेतुकं शशविषाणादि-<br>कार्यं नास्ति । तथा सच्च<br>विद्यमानं घटादि विद्यमान-<br>घटादिवस्त्वन्तरकार्यं नास्ति ।<br>सत्कार्यमसत्कृत एव सम्भवति ?<br>न चान्यः कार्यकारणभावः<br>सम्भवति शक्यो वा कल्पयितुम् ?<br>अतो विवेकिनामसिद्ध एव कार्य-<br>कारणभावः कस्यचिदित्य-<br>भिप्रायः ॥ ४० ॥असत् कारणवाला असत्पदार्थ<br>भी नहीं है—जिस आकाशपुष्प<br>आदि असत्पदार्थका कोई शश-<br>शृङ्गादि असत् कारण हो ऐसा कोई<br>असद्धेतुक असत् पदार्थ भी विद्यमान<br>नहीं है । तथा घटादि सद्वस्तु भी<br>असद्धेतुक अर्थात् शशविषाणादि<br>[असत्पदार्थ] का कार्य नहीं है। इसी<br>प्रकार सत् यानी विद्यमान घट<br>आदि किसी अन्य सद्वस्तुका भी कार्य<br>नहीं है। फिर सत्का कार्य असत् ही<br>कैसे हो सकता है? इनके सिवा किसी<br>अन्य कार्य-कारण भावकी न तो<br>सम्भावना है और न कल्पना<br>ही की जा सकती है । अतः<br>तात्पर्य यह है कि विवेकियाेंके लिये<br>तो किसी वस्तुका भी कार्य-कारण-<br>भाव सिद्ध है ही नहीं ॥ ४० ॥

पुनरपि जाग्रत्स्वप्नयोरसतोपि<br>कार्यकारणभावाशङ्कामपनयन्<br>आह—जाग्रत् और स्वप्न असत् होनेपर<br>भी उनके कार्य-कारणभावके सम्बन्ध-<br>में जो शङ्का है उसकी निवृत्ति<br>करते हुए फिर भी कहते हैं—

विपर्यासाद्यथा जाग्रदचिन्त्यान्भूतवत्स्पृशेत् ।

तथा स्वप्ने विपर्यासाद्धर्मांस्तत्रैव पश्यति ॥ ४१ ॥

जिस प्रकार मनुष्य भ्रान्तिवश जाग्रत्कालीन अचिन्त्य पदार्थोंको यथार्थवत् ग्रहण करता है उसी प्रकार स्वप्नमें भी भ्रान्तिवश [ स्वप्नकालीन ] पदार्थोंको वहीं ( उसी अवस्थामें ) देखता है ॥ ४१ ॥