माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २२० | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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विपर्यासादविवेक्तो यथा जाग्रज्जागरितेऽचिन्त्यान्भावान्-शक्यचिन्तनीयान् रज्जुसर्पादीन् भूतवत्परमार्थवत्स्पृशन्निव विकल्पयेदित्यर्थः कश्चिद्यथा, तथा स्वप्ने विपर्यासाद्धस्त्यादीन्धर्मान् पश्यन्निव विकल्पयति; तत्रैव पश्यति न तु जागरितादुत्पद्यमानानित्यर्थः ॥ ४१ ॥ | जिस प्रकार कोई पुरुष विपर्यास अर्थात् अविवेकके कारण जाग्रत्-अवस्था में रज्जु-सर्पादि अचिन्तनीय अर्थात् जिनका चिन्तन नहीं किया जा सकता ऐसे पदार्थोंको भूत—परमार्थवत् स्पर्श करते हुए-से कल्पना करता है । उसी प्रकार स्वप्नमें विपर्यासके कारण ही वह हाथी आदिको देखता हुआ-सा कल्पना करता है; अर्थात् उन्हें वह उसी अवस्थामें देखता है, न कि जाग्रत्से उत्पन्न होते हुए ॥४१॥
जगदुत्पत्तिका उपदेश किनके लिये हैं ?
उपसम्भात्समाचारादस्तिवस्तुत्ववादिनाम् ।
जातिस्तु देशिता बुद्धैरजातेस्त्रसतां सदा ॥ ४२ ॥
[ वस्तुओंकी ] उपलब्धि और [ वर्णाश्रमादि ] आचारके कारण जो पदार्थोंकी सत्ता स्वीकार करते हैं तथा अजातिसे भय मानते हैं, विद्वानोंने सर्वदा उन्हींके लिये जातिका उपदेश दिया है ॥ ४२ ॥
यापि बुद्धैरद्वैतवादिभिर्जातिर्दर्शितापदष्टा, उपलम्भनम् उपलम्भस्तस्मादुपलब्धेरित्यर्थः; समाचाराद्वर्णाश्रमादिधर्मसमाचरणात् , ताभ्यां हेतुभ्यामस्तिवस्तुत्ववादिनाम् अस्ति वस्तुभाव इत्येवं वदनशीलानां | तथा बुद्ध यानी अद्वैतवादी विद्वानोंने जो जाति (जगत्की उत्पत्ति) का उपदेश दिया है [ उसका यह कारण है— ] उपलम्भनका नाम उपलम्भ है उस उपलम्भ अर्थात् उपलब्धिसे और समाचार—वर्णाश्रमादि धर्मोंके सम्यक् आचरणसे—इन दोनों कारणोंसे वस्तुओंका अस्तित्व माननेवाले अर्थात् ‘[ द्वैत पदार्थोंका ] वस्तुत्व है' ऐसा कहने-