भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण २२१


दृढांग्रहवतां श्रद्दधानानां मन्द-<br><br>विवेकिनामर्थोपायत्वेन सा<br><br>दर्शिता जातिः । तां गृह्णन्तु<br><br>तावत् । वेदान्ताभ्यासिनां तु<br><br>स्वयमेवाजाद्वयात्मविषयो विवेको<br><br>भविष्यतीति न तु परमार्थ-<br><br>बुद्ध्या। ते हि श्रोत्रियाः स्थूल-<br><br>बुद्धित्वादजातेः अजातिवस्तुनः<br><br>सदा त्रस्यन्त्यात्मनाशं मन्यमाना<br><br>अविवेकिन इत्यर्थः । उपायः<br><br>सोऽवतारायेत्युक्तम् ॥ ४२ ॥वाले दृढ आग्रही, श्रद्धालु और मन्द विवेकशील पुरुषोंको [ ब्रह्मात्मैक्य-बोधकी प्राप्तिरूप ] अर्थके उपाय-रूपसे उस जातिका उपदेश दिया है। [ उसमें उनका यही तात्पर्य है कि ] 'अभी वे भले ही उसे स्वीकार कर लें, परन्तु वेदान्तका अभ्यास करते-करते उन्हें स्वयं ही अजन्मा और अद्वितीय आत्मा-सम्बन्धी विवेक हो जायगा' उन्होंने परमार्थबुद्धिसे उसका उपदेश नहीं दिया; क्योंकि वे केवल श्रुति-परायण 'अविवेकी लोग स्थूलबुद्धि होनेके कारण अपना नाश मानते हुए अजाति अर्थात् जन्मरहित वस्तुसे सदा भय मानते हैं—यह इसका तात्पर्य है। यही बात हमने "उपायः सोऽवताराय" इत्यादि श्लोकमें (अद्वैतप्रकरण श्लो० १५ में ) कही है ॥४२॥

सन्मार्गगामी द्वैतवादियोंकी गति

अजातेस्त्रसतां तेषामुपलम्भाद्वियन्ति ये ।
जातिदोषा न सेत्स्यन्ति दोषोऽप्यल्पो भविष्यति ॥४३॥

द्वैतकी उपलब्धिके कारण जो विपरीत मार्गमें प्रवृत्त होते हैं अजातिसे भय माननेवाले उन लोगोंके लिये जातिसम्बन्धी दोष सिद्ध नहीं

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