भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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२१८माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० कां०

जात्याभासं चलाभासं वस्त्वाभासं तथैव च ।

अजाचलमवस्तुत्वं विज्ञानं शान्तमद्वयम् ॥ ४५ ॥

जो कुछ जातिके समान भासनेवाला, चलके समान भासनेवाला और वस्तुके समान भासनेवाला है वह अज, अचल और अवस्तुरूप शान्त एवं अद्वितीय विज्ञान ही है ॥ ४५ ॥


अजाति सजातिवदवभासत इति जात्याभासम् । तद्यथा देवदत्तो जायत इति । चलाभासं चलमिवाभासत इति । यथा स एव देवदत्तो गच्छतीति । वस्त्वाभासं वस्तु द्रव्यं धर्मि तद्वदवभासत इति वस्त्वाभासम् । यथा स एव देवदत्तो गौरो दीर्घ इति । जायते देवदत्तः स्पन्दते दीर्घो गौर इत्येवमवभासते । परमार्थतस्त्वजमचलमवस्तुत्वमद्वयं च । किं तदेवंप्रकारम् ? विज्ञानं विज्ञप्तिः । जात्यादिरहितत्वाच्छान्तम् । अत एवाद्वयं चेत्यर्थः ॥ ४५ ॥जो अजाति होकर भी जातिवत् प्रतीत हो उसे जात्याभास कहते हैं; उसका उदाहरण, जैसे—देवदत्त उत्पन्न होता है । जो चलके समान प्रतीत हो उसे चलाभास कहते हैं; जैसे—वही देवदत्त जाता है । 'वस्त्वाभासम्'—वस्तु धर्मी द्रव्यको कहते हैं, जो उसके समान प्रतीत हो वह वस्त्वाभास है । जैसे—वही देवदत्त गौर और दीर्घ है । देवदत्त उत्पन्न होता है, चलता है तथा वह गौर और दीर्घ है—इस प्रकार भासता है, किन्तु परमार्थतः तो अज, अचल, अवस्तुत्व और अद्वयत्व ही है। ऐसा वह कौन है? [इसपर कहते हैं—] विज्ञान अर्थात् विज्ञप्ति तथा वह जाति आदिसे रहित होनेके कारण शान्त है और इसीसे अद्वय भी है—ऐसा इसका तात्पर्य है ॥ ४५ ॥