माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
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शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण २२५
एवं न जायते चित्तमेवं धर्मा अजाः स्मृताः ।
एवमेव विजानन्तो न पतन्ति विपर्यये ॥ ४६ ॥
इस प्रकार चित्त उत्पन्न नहीं होता; इसीसे आत्मा अजन्मा माने गये हैं । ऐसा जाननेवाले लोग ही भ्रममें नहीं पड़ते ॥ ४६ ॥
| एवं यथोक्तेभ्यो हेतुभ्यो न जायते चित्तमेवं धर्मा आत्मानोऽजाः स्मृता ब्रह्मविद्भिः । धर्मा इति बहुवचनं देहभेदानुविधायित्वादद्वयस्यैवोपचारतः ।<br><br>एवमेव यथोक्तं विज्ञानं जात्यादिरहितमद्वयमात्मतत्त्वं विजानन्तस्त्यक्तबाह्यैषणाः पुनर्न पतन्त्यविद्याध्वान्तसागरे विपर्यये । “तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः” (ई० उ० ७) इत्यादिमन्त्रवर्णात् ॥४६॥ | इस प्रकार उपर्युक्त हेतुओंसे ही चित्तका जन्म नहीं होता, और इसीसे ब्रह्मवेत्ताओंने धर्म यानी आत्माओंको अजन्मा माना है । भिन्न-भिन्न देहोंका अनुवर्तन करनेवाला होनेसे एक अद्वितीय आत्माके लिये ही उपचारसे ‘धर्माः’ इस बहुवचनका प्रयोग किया गया है ।<br><br>इसी प्रकार—उपर्युक्त विज्ञानको अर्थात् जाति आदिरहित अद्वितीय आत्मतत्त्वको जाननेवाले बाह्य एषणाओंसे मुक्त हुए लोग फिर विपर्यय अर्थात् अविद्यारूप अन्धकारके समुद्रमें नहीं गिरते । “उस अवस्थामें एकत्व देखनेवाले पुरुषको क्या मोह और क्या शोक हो सकता है ?” इत्यादि मन्त्रवर्णसे यही बात प्रमाणित होती है ॥४६॥ |
विज्ञानाभासमें अलातस्फुरणका दृष्टान्त
| यथोक्तं परमार्थदर्शनं प्रपञ्चयिष्यन्नाह— | पूर्वोक्त परमार्थज्ञानका ही विस्तारसे निरूपण करेंगे, इसलिये कहते हैं— |