माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished301 पृष्ठ
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शां० भा० ] आगम-प्रकरण ५
| प्रतिपत्तिस्तस्य द्वैतस्य हेतुतो वैतथ्यप्रतिपादनाय द्वितीयं प्रकरणम् । तथाद्वैतस्यापि वैतथ्यप्रसङ्गप्राप्तौ युक्तितस्तथा-त्वदर्शनाय तृतीयं प्रकरणम् । अद्वैतस्य तथात्वप्रतिपत्तिप्रतिपक्ष-भूतानि यानि वादान्तराण्यवैदि-कानि तेषामन्योन्यविरोधि-त्वादतथार्थत्वेन तदुपपत्तिभिरेव निराकरणाय चतुर्थं प्रकरणम् । | तत्त्वका बोध होता है उसी द्वैतका युक्तिपूर्वक मिथ्यात्व प्रतिपादन करने-के लिये [ वैतथ्यनामक ] द्वितीय प्रकरण है । इसी प्रकार अद्वैतके भी मिथ्यात्वका प्रसंग उपस्थित न हो जाय इसलिये युक्तिद्वारा उसका सत्यत्व प्रतिपादन करनेके लिये तृतीय ( अद्वैत ) प्रकरण है । तथा अद्वैतके सत्यत्व-निश्चयके विपक्षी जो अन्य अवैदिक मतान्तर हैं वे परस्पर विरोधी होनेके कारण मिथ्या हैं, अतः उन्हींकी युक्तियोंसे उनका खण्डन करनेके लिये चतुर्थ (अलात शान्ति ) प्रकरण है । |
| कथं पुनरोङ्कारनिर्णय आत्म-तत्त्वप्रतिपत्त्युपा-यत्वं प्रतिपद्यत इत्युच्यते—<br>(ओंकारस्य आत्मप्रतिपत्ति-साधनत्वम्) | ओंकारका निर्णय किस प्रकार आत्मतत्त्वकी प्राप्तिका उपाय होता है, सो अब बतलाया जाता है— |
| “ओमित्येतत्” (क० उ० १।२।१५) “एतदालम्बनम्” (क० उ० १।२।१७) “एतद्वै सत्य-काम” (प्र० उ० ५।२) “ओमि-त्यात्मानं युञ्जीत” ( मैत्र्यु० ६।३ ) “ओमिति ब्रह्म” ( तै० उ० १।८।१ ) “ओङ्कार एवेदं सर्वम्” ( छा० उ० २।२३।३ ) इत्यादिश्रुतिभ्यः । | “ॐ यही [ वह पद ] है” “यही आलम्बन है” “हे सत्यकाम ! यह [ जो ओंकार है वही पर और अपर ब्रह्म है ]” “आत्माका ॐ इस प्रकार ध्यान करे” “ॐ यही ब्रह्म है” “यह सब ओंकार ही है” इत्यादि श्रुतियोंसे यही बात जानी जाती है । |
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