माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished301 पृष्ठ
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| ६ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| ओंकारस्य सर्वास्पदत्वम् | |
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| विकल्पस्यास्पदोऽद्वय आत्मा परमार्थः सन्प्राणादिविकल्पस्यास्पदो यथा तथा सर्वोऽपि वाक्प्रपञ्चः प्राणाद्यात्मविकल्पविषय ओङ्कार एव । स चात्मस्वरूपमेव, तदभिधायकत्वात् । ओङ्कारविकारशब्दाभिधेयश्च सर्वः प्राणादिरात्मविकल्पोऽभिधानव्यतिरेकेण नास्ति । "वाचारम्भणं विकारो नामधेयम्" (छा० उ० ६।१।४) "तदस्येदं वाचा तन्त्या नामभिर्दामभिः सर्वं सितम्" "सर्वं हीदं नामनि" इत्यादिश्रुतिभ्यः । <br><br> अत आह— | रज्जु आदिके समान जिस प्रकार अद्वितीय आत्मा परमार्थ सत्य होनेपर भी प्राणादि विकल्पका आश्रय है उसी प्रकार प्राणादि विकल्पको विषय करनेवाला सम्पूर्ण वाग्विलास ओंकार ही है। और वह (ओंकार) आत्माका प्रतिपादन करनेवाला होनेसे उसका स्वरूप ही है। तथा ओंकारके विकाररूप शब्दोंके प्रतिपाद्य आत्माके विकल्परूप समस्त प्राणादि भी अपने प्रतिपादक शब्दोंसे भिन्न नहीं हैं, जैसा कि "विकार केवल वाणीका विलास और नाममात्र है" "उस ब्रह्मका यह सम्पूर्ण जगत् वाणीरूप सूत्रद्वारा नाममयी डोरीसे व्याप्त है" "यह सब नाममय ही है" इत्यादि श्रुतियोंसे सिद्ध होता है। <br><br> इसीलिये कहते हैं— |
ॐ ही सब कुछ है
ओमित्येतदक्षरमिदꣳ सर्वं तस्योपव्याख्यानं भूतं भवद्भविष्यदिति सर्वमोङ्कार एव । यच्चान्यत्त्रिकालातीतं तदप्योङ्कार एव ॥१॥
ॐ यह अक्षर ही सब कुछ है। यह जो कुछ भूत, भविष्यत् और वर्तमान है उसीकी व्याख्या है; इसलिये यह सब ओंकार ही है। इसके सिवा जो अन्य त्रिकालातीत वस्तु है वह भी ओंकार ही है ॥ १ ॥