माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished301 पृष्ठ
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शां० भा० ] आगम-प्रकरण ७
| ओमित्येतदक्षरमिदं सर्वमिति । यदिदमर्थजातमभिधेयभूतं तस्याभिधानाव्यतिरेकात्, अभिधानस्य चोङ्काराव्यतिरेकादोङ्कार एवेदं सर्वम् । परं च ब्रह्माभिधानाभिधेयोपायपूर्वकमेव गम्यत इत्योङ्कार एव । | ॐ यह अक्षर ही सब कुछ है। यह अभिधेय ( प्रतिपाद्य ) रूप जितना पदार्थसमूह है वह अपने अभिधान ( प्रतिपादक ) से अभिन्न होनेके कारण और सम्पूर्ण अभिधान भी ओंकारसे अभिन्न होनेके कारण यह सब कुछ ओंकार ही है। पर-ब्रह्म भी अभिधान-अभिधेय ( वाच्य-वाचक ) रूप उपायके द्वारा ही जाना जाता है, इसलिये वह भी ओंकार ही है । |
|---|---|
| तस्यैतस्य परापरब्रह्मरूपस्याक्षरस्योमित्येतस्योपव्याख्यानम्; ब्रह्मप्रतिपत्त्युपायत्वाद्ब्रह्मसमीपतया विस्पष्टं प्रकथनमुपव्याख्यानं प्रस्तुतं वेदितव्यमिति वाक्यशेषः। | यह जो परापर ब्रह्मरूप अक्षर ॐ है, उसका उपव्याख्यान—ब्रह्मकी प्राप्तिका उपाय होनेके कारण उसके समीपतासे स्पष्ट कथनका नाम उपव्याख्यान है वही—यहाँ प्रस्तुत जानना चाहिये । इस वाक्यमें 'प्रस्तुतं वेदितव्यम् ( प्रस्तुत जानना चाहिये )' यह वाक्यशेष है । |
| भूतं भवद्भविष्यदिति कालत्रयपरिच्छेद्यं यत्तदप्योङ्कार एवोक्तन्यायतः । यच्चान्यत्त्रिकालातीतं कार्याधिगम्यं कालापरिच्छेद्यमव्याकृतादि तदप्योङ्कार एव ॥ १ ॥ | भूत, वर्तमान और भविष्यत् इन तीनों कालोंसे जो कुछ परिच्छेद्य है वह भी उपर्युक्त न्यायसे ओंकार ही है। इसके सिवा जो तीनों कालोंसे परे, अपने कार्यसे ही विदित होनेवाला और कालसे अपरिच्छेद्य अव्याकृत आदि है वह भी ओंकार ही है ॥ १ ॥ |