भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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पृष्ठ 28
माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०

ओंकारवाच्य ब्रह्मकी सर्वात्मकता

अभिधानाभिधेययोरेकत्वेऽप्य-वाचक और वाच्यका अभेद होने-
भिधानप्राधान्येन निर्देशः कृतः।पर भी वाचककी प्रधानतासे ही ॐ
ओमित्येतदक्षरमिदं सर्वमित्यादि।यह अक्षर ही सब कुछ है
अभिधानप्राधान्येन निर्दिष्टस्यइत्यादि रूपसे निर्देश किया गया
पुनरभिधेयप्राधान्येन निर्देशो-है। वाचककी प्रधानतासे निर्दिष्ट
ऽभिधानाभिधेययोरेकत्वप्रति-वस्तुका फिर वाच्यकी प्रधानतासे
पत्त्यर्थः । इतरथा ह्यभिधान-किया हुआ निर्देश वाचक और
तन्त्राभिधेयप्रतिपत्तिरित्याभिधे-वाच्यका एकत्व प्रतिपादन करनेके
यस्याभिधानत्वं गौणमित्याशङ्कालिये है; अन्यथा वाच्यकी प्रतिपत्ति
स्यात् । एकत्वप्रतिपत्तेश्च प्रयो-वाचकके अधीन होनेके कारण
जनमभिधानाभिधेययोरेकेनैववाच्यका वाचकरूप होना गौण
प्रयत्नेन युगपत्प्रविलापयंस्त-ही होगा—ऐसी आशंका हो सकती
द्विलक्षणं ब्रह्म प्रतिपद्येतेति ।है। किन्तु वाच्य (ब्रह्म) और
तथा च वक्ष्यति "पादा मात्रावाचक (ओंकार) की एकत्व-
मात्राश्च पादाः" (मा० उ० ८)प्रतिपत्तिका तो यही प्रयोजन है कि
इति। तदाह—उन दोनोंको एक ही प्रयत्नसे एक
साथ लीन करके उनसे विलक्षण
ब्रह्मको प्राप्त किया जाय । ऐसा ही
"पाद ही मात्रा हैं और मात्रा ही
पाद हैं" इस श्रुतिसे कहेंगे भी।
अब वही बात कहते हैं—

सर्वँ ह्येतद् ब्रह्मायमात्मा ब्रह्म सोऽयमात्मा चतुष्पात् ॥२॥

यह सब ब्रह्म ही है। यह आत्मा भी ब्रह्म ही है। वह यह आत्मा चार पादों (अंशों) वाला है ॥२॥