माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished301 पृष्ठ
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| ८ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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ओंकारवाच्य ब्रह्मकी सर्वात्मकता
| अभिधानाभिधेययोरेकत्वेऽप्य- | वाचक और वाच्यका अभेद होने- |
| भिधानप्राधान्येन निर्देशः कृतः। | पर भी वाचककी प्रधानतासे ही ॐ |
| ओमित्येतदक्षरमिदं सर्वमित्यादि। | यह अक्षर ही सब कुछ है |
| अभिधानप्राधान्येन निर्दिष्टस्य | इत्यादि रूपसे निर्देश किया गया |
| पुनरभिधेयप्राधान्येन निर्देशो- | है। वाचककी प्रधानतासे निर्दिष्ट |
| ऽभिधानाभिधेययोरेकत्वप्रति- | वस्तुका फिर वाच्यकी प्रधानतासे |
| पत्त्यर्थः । इतरथा ह्यभिधान- | किया हुआ निर्देश वाचक और |
| तन्त्राभिधेयप्रतिपत्तिरित्याभिधे- | वाच्यका एकत्व प्रतिपादन करनेके |
| यस्याभिधानत्वं गौणमित्याशङ्का | लिये है; अन्यथा वाच्यकी प्रतिपत्ति |
| स्यात् । एकत्वप्रतिपत्तेश्च प्रयो- | वाचकके अधीन होनेके कारण |
| जनमभिधानाभिधेययोरेकेनैव | वाच्यका वाचकरूप होना गौण |
| प्रयत्नेन युगपत्प्रविलापयंस्त- | ही होगा—ऐसी आशंका हो सकती |
| द्विलक्षणं ब्रह्म प्रतिपद्येतेति । | है। किन्तु वाच्य (ब्रह्म) और |
| तथा च वक्ष्यति "पादा मात्रा | वाचक (ओंकार) की एकत्व- |
| मात्राश्च पादाः" (मा० उ० ८) | प्रतिपत्तिका तो यही प्रयोजन है कि |
| इति। तदाह— | उन दोनोंको एक ही प्रयत्नसे एक |
| साथ लीन करके उनसे विलक्षण | |
| ब्रह्मको प्राप्त किया जाय । ऐसा ही | |
| "पाद ही मात्रा हैं और मात्रा ही | |
| पाद हैं" इस श्रुतिसे कहेंगे भी। | |
| अब वही बात कहते हैं— |
सर्वँ ह्येतद् ब्रह्मायमात्मा ब्रह्म सोऽयमात्मा चतुष्पात् ॥२॥
यह सब ब्रह्म ही है। यह आत्मा भी ब्रह्म ही है। वह यह आत्मा चार पादों (अंशों) वाला है ॥२॥