भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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शां० भा० ] आगम-प्रकरण ९


सर्वं ह्येतद्ब्रह्मेति । सर्वं यदुक्तमोङ्कारमात्रमिति तदेतद्ब्रह्म । तच्च ब्रह्म परोक्षाभिहितं प्रत्यक्षतो विशेषेण निर्दिशति—अयमात्मा ब्रह्मेति । अयमिति चतुष्पात्त्वेन प्रविभज्यमानं प्रत्यगात्मतयाऽभिनयेन निर्दिशति—अयमात्मेति । सोऽयमात्माऽोङ्काराभिधेयः परापरत्वेन व्यवस्थितश्चतुष्पात्कार्षापणवन्न गौरिवेति । त्रयाणां विश्वादीनां पूर्वपूर्वप्रविलापनेन तुरीयस्य प्रतिपत्तिरिति करणसाधनः पादशब्दः । तुरीयस्य पद्यत इति कर्मसाधनः पादशब्दः ॥ २ ॥यह सब ब्रह्म ही है। अर्थात् यह सब, जो ओंकारमात्र कहा गया है, ब्रह्म है। अबतक परोक्षरूपसे बतलाये हुए उस ब्रह्मको विशेषरूपसे प्रत्यक्षतया 'यह आत्मा ब्रह्म है' ऐसा कहकर निर्देश करते हैं। यहाँ 'अयम्' शब्दद्वारा चतुष्पादरूपसे विभक्त किये जानेवाले आत्माको अपने अन्तरात्मस्वरूपसे अभिनय (अंगुलि-निर्देश) पूर्वक 'अयमात्मा ब्रह्म' ऐसा कहकर बतलाते हैं। ओंकार नामसे कहा जानेवाला तथा पर और अपर-रूपसे व्यवस्थित वह यह आत्मा कार्षापणके* समान चार पाद (अंश) वाला है, गौके समान नहीं। विश्व आदि तीन पादोंमेंसे क्रमशः पूर्व-पूर्व-का लय करते हुए अन्तमें तुरीय ब्रह्मकी उपलब्धि होती है। अतः पहले तीन पादोंमें 'पाद' शब्द करणवाच्य है और तुरीयमें 'जो प्राप्त किया जाय' इस प्रकार कर्मवाच्य है ॥२॥
कथं चतुष्पात्त्वमित्याह—वह किस प्रकार चार पादोंवाला है सो बतलाते हैं—

* किसी देशविशेषमें प्रचलित सिक्केका नाम कार्षापण है। यह सोलह पणका होता है। जिस प्रकार रुपयेमें चार चवन्नी अथवा सेरमें चार पौवे होते हैं उसी प्रकार उसमें चार पाद माने गये हैं।