भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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पृष्ठ 30

१० माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०


आत्माका प्रथम पाद—वैश्वानर

जागरितस्थानो बहिष्प्रज्ञः सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः स्थूलभुग्वैश्वानरः प्रथमः पादः ॥३॥

जाग्रत् अवस्था जिस [ की अभिव्यक्ति ] का स्थान है, जो बहिः-प्रज्ञ (बाह्य विषयोंको प्रकाशित करनेवाला) सात अंगोंवाला, उन्नीस मुखोंवाला और स्थूल विषयोंका भोक्ता है वह वैश्वानर पहला पाद है।३।


जागरितं स्थानमस्येति जागरितस्थानः । बहिष्प्रज्ञः स्वात्मव्यतिरिक्ते विषये प्रज्ञा यस्य स बहिष्प्रज्ञो बहिर्विषयेव प्रज्ञाऽविद्याकृतावभासत इत्यर्थः । तथा सप्ताङ्गन्यस्य "तस्य ह वा एतस्यात्मनो वैश्वानरस्य मूर्धैव सुतेजाश्चक्षुर्विश्वरूपः प्राणः पृथग्वर्त्मात्मा संदेहो बहुलो बस्तिरेव रयिः पृथिव्येव पादौ" (छा० उ० ५।१८।२) इत्यग्निहोत्रकल्पनाशेषत्वेनाहवनीयोऽग्निरस्य मुखत्वेनोक्त इत्येवं सप्ताङ्गानि यस्य स सप्ताङ्गः । <br><br> तथैकोनविंशतिर्मुखान्‍यस्य बुद्धीन्द्रियाणि कर्मेन्द्रियाणि च दश वायवश्च प्राणादयः पञ्चजाग्रत्-अवस्था जिसका स्थान है उसे जागरितस्थान कहते हैं । जिसकी अपनेसे भिन्न विषयोंमें प्रज्ञा है उसे बहिष्प्रज्ञ कहते हैं, अर्थात् जिसकी अविद्याकृत बुद्धि बाह्य विषयोंसे सम्बद्ध-सी भासती है। इसी प्रकार जिसके सात अंग हैं अर्थात् "इस उस वैश्वानर आत्माका द्युलोक शिर है, सूर्य नेत्र है, वायु प्राण है, आकाश मध्यस्थान (देह) है, अन्न (अन्नका कारणरूप जल) ही मूत्र स्थान है और पृथिवी ही चरण है" इस श्रुतिके अनुसार अग्निहोत्रकल्पनामें अंगभूत होनेके कारण आहवनीय अग्नि उसके मुखरूपसे बतलाया गया है। इस प्रकार जिसके सात अंग हैं उसे ही सप्तांग कहते हैं । <br><br> तथा जिसके उन्नीस मुख हैं, दश तो ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय, पाँच प्राणादि वायु, तथा मन, बुद्धि,