भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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शां० भा० ] आगम-प्रकरण ११


मनो बुद्धिरहङ्कारश्चित्तमिति मुखानीव मुखानि तान्युपलब्धिद्वाराणीत्यर्थः, स एवंविशिष्टो वैश्वानरो यथोक्तद्वारैः शब्दादीन्स्थूलान्विषयान्भुङ्क्त इति स्थूलभुक् । विश्वेषां नराणामनेकधा नयनाद्वैश्वानरः । यद्वा विश्वश्चासौ नरश्चेति विश्वानरः । विश्वानर एव वैश्वानरः । सर्वपिण्डात्मनानन्यत्वात् स प्रथमः पादः । एतत्पूर्वकत्वादुत्तरपादाधिगमस्य प्राथम्यमस्य ।अहंकार और चित्त—ये जिसके मुखके समान मुख अर्थात् उपलब्धिके द्वार हैं, वह ऐसे विशेषणोंवाला वैश्वानर उपर्युक्त द्वारोंसे शब्द आदि स्थूल विषयोंको भोगता है इसलिये वह स्थूलभुक् है । सम्पूर्ण नरोंको [अनेक प्रकारकी योनियोंमें] नयन (वहन) करनेके कारण वह ‘वैश्वानर’ कहलाता है; अथवा वह विश्व (समस्त) नररूप है इसलिये विश्वानर है । विश्वानर ही [स्वार्थमें तद्धित अण् प्रत्यय होनेसे] वैश्वानर कहलाता है । समस्त देहोंसे अभिन्न होनेके कारण वही पहला पाद है । परवर्ती पादोंका ज्ञान पहले इसका ज्ञान होनेपर ही होता है, इसलिये यह प्रथम है ।
कथमयमात्मा ब्रह्मेति प्रत्यगात्मनोऽस्य चतुष्पात्त्वे प्रकृते द्युलोकादीनां मूर्धाद्यङ्गत्वमिति ।शंका—“अयमात्मा ब्रह्म” इस श्रुतिके अनुसार यहाँ प्रत्यगात्माको चार पादोंवाला बतलानेका प्रसङ्ग था। उसमें द्युलोकादिको उसके मूर्धा आदि अंगरूपसे कैसे बतलाने लगे ?
(वैश्वानरस्य सप्ताङ्गत्त्वादिप्रतिपादने हेतुः चतुष्पात्त्वस्य)<br>नैष दोषः । सर्वस्य प्रपञ्चस्य साधिदैविकस्यानेनात्मना विवक्षितत्वात् ।**समाधान—**यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि इस आत्माके द्वारा ही अधिदैवसहित सम्पूर्ण प्रपञ्चके चतुष्पात्त्वका प्रतिपादन करना इष्ट है ।