भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण २६३


| यावत्सम्यग्दर्शनेन हेतुफला- | जबतक सम्यग्ज्ञानसे हेतु और | | वेशो न निवर्ततेऽक्षीणः संसार- | फलका आग्रह निवृत्त नहीं होता | | स्तावदायतो दीर्घो भवतीत्यर्थः। | तबतक संसार क्षीण न होकर | | क्षीणे पुनर्हेतुफलावेशे संसारं न | विस्तृत होता जाता है। किन्तु | | प्रपद्यते कारणाभावात् ॥ ५६ ॥ | हेतुफलावेशके क्षीण होनेपर, कोई | | | कारण न रहनेसे, विद्वान् संसारको | | | प्राप्त नहीं होता ॥ ५६ ॥ |


| नन्वजादात्मनोऽन्यन्नास्त्येव | शंका—अजन्मा आत्मासे भिन्न | | तत्कथं हेतुफलयोः संसारस्य | तो और कोई है ही नहीं; फिर हेतु | | चोत्पत्तिविनाशावुच्येते त्वया ? | और फल तथा संसारके उत्पत्ति- | | शृणु— | विनाशका तुम कैसे वर्णन कर रहे हो ? | | | समाधान—अच्छा, सुनो— |

संवृत्या जायते सर्वं शाश्वतं नास्ति तेन वै ।
सद्भावेन ह्यजं सर्वमुच्छेदस्तेन नास्ति वै ॥ ५७ ॥

सारे पदार्थ व्यावहारिक दृष्टिसे उत्पन्न होते हैं; इसलिये वे नित्य नहीं हैं । परमार्थदृष्टिसे तो सब कुछ अज ही है; इसलिये किसीका विनाश भी नहीं है ॥ ५७ ॥

| संवृत्या संवरणं संवृति- | 'संवृत्या'—संवरण अर्थात् | | रविद्याविषयो लौकिको व्यव- | अविद्याविषयक लौकिक व्यवहारका | | हारस्तया संवृत्या जायते सर्वम् । | नाम संवृति है; उस संवृतिसे ही | | तेनाविद्याविषये शाश्वतं नित्यं | सबकी उत्पत्ति होती है। अतः | | नास्ति वै । अत उत्पत्तिविनाश- | उस अविद्याके अधिकारमें कोई भी | | | वस्तु शाश्वत-नित्य नहीं है । | | | इसीलिये उत्पत्ति-विनाशशील संसार |