भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished301 पृष्ठ

पृष्ठ 254, कुल 301 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 254
२३४माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०
लक्षणः संसार आयत इत्युच्यते । परमार्थसद्भावेन त्वजं सर्वमात्मैव यस्मात् । अतो जात्यभावादुच्छेदस्तेन नास्ति वै कस्यचिद्धेतुफलादेरित्यर्थः ॥ ५७ ॥विस्तृत है—ऐसा कहा जाता है; क्योंकि परमार्थसत्तासे तो सब कुछ अजन्मा आत्मा ही है। अतः जन्मका अभाव होनेके कारण किसी भी हेतु या फल आदिका उच्छेद नहीं होता—ऐसा इसका तात्पर्य है ॥५७॥

जीवोंका जन्म मायिक है

धर्मा य इति जायन्ते जायन्ते ते न तत्त्वतः ।
जन्म मायोपमं तेषां सा च माया न विद्यते ॥ ५८ ॥

धर्म (जीव) जो उत्पन्न होते कहे जाते हैं वे वस्तुतः उत्पन्न नहीं होते । उनका जन्म मायाके सदृश है और वह माया भी [वस्तुतः] है नहीं ॥ ५८ ॥

येऽप्यात्मानोऽन्ये च धर्मा जायन्त इति कल्प्यन्ते त इत्येवं-प्रकारा यथोक्ता संवृतिर्निर्दिश्यत इति संवृत्येव धर्मा जायन्ते; न ते तत्त्वतः परमार्थतो जायन्ते । यत्पुनस्तत्संवृत्या जन्म तेषां धर्माणां यथोक्तानां यथा मायया जन्म तथा तन्मायोपमं प्रत्ये-तव्यम् ।जो भी आत्मा तथा दूसरे धर्म 'उत्पन्न होते हैं'—इस प्रकार कल्पना किये जाते हैं वे इस प्रकारके सभी धर्म संवृतिसे ही उत्पन्न होते हैं। यहाँ 'इति' शब्दसे इससे पहले श्लोकमें कही हुई संवृतिका निर्देश किया गया है। वे तत्त्वतः—परमार्थतः उत्पन्न नहीं होते । क्योंकि उन पूर्वोक्त धर्मोंका जो संवृतिसे होनेवाला जन्म है वह ऐसा है जैसे मायासे होनेवाला जन्म होता है, इसलिये उसे मायाके सदृश समझना चाहिये ।