माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished301 पृष्ठ
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| शां० भा० ] | अलातशान्तिप्रकरण | २३५ |
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| माया नाम वस्तु तर्हि? नैवम्;<br>सा च माया न विद्यते, मायेत्य-<br>विद्यमानस्याख्येत्यभिप्रायः॥५८॥ | तब तो माया एक सत्य वस्तु सिद्ध होती है? नहीं, ऐसी बात नहीं है। वह माया भी है नहीं। तात्पर्य यह है कि 'माया' यह अविद्यमान वस्तुका ही नाम है ॥५८॥ |
| कथं मायोपमं तेषां धर्माणां जन्मेत्याह— | उन धर्मोंका जन्म मायाके सदृश किस प्रकार है? सो बतलाते हैं— |
यथा मायामयाद्वीजाज्जायते तन्मयोऽङ्कुरः ।
नासौ नित्यो न चोच्छेदी तद्वद्धर्मेषु योजना ॥ ५६ ॥
जिस प्रकार मायामय बीजसे मायामय अङ्कुर उत्पन्न होता है, और वह न तो नित्य ही होता है और न नाशवान् ही, उसी प्रकार धर्मोंके विषयमें भी युक्ति समझनी चाहिये ॥ ५९ ॥
| यथा मायामयादाम्रादिवीजाज्जायते तन्मयो मायामयोऽङ्कुरो नासावङ्कुरो नित्यो न चोच्छेदी विनाशी वाभूतत्वात्तद्वदेव धर्मेषु जन्मनाशादियोजना युक्तिः । न तु परमार्थतो धर्माणां जन्म नाशो वा युज्यत इत्यर्थः ॥ ५९ ॥ | जिस प्रकार मायामय आम आदिके बीजसे तन्मय अर्थात् मायामय अङ्कुर उत्पन्न होता है और वह अङ्कुर न तो नित्य ही होता है और न नाशवान् ही, उसी प्रकार असत्य होनेके कारण धर्मोंमें भी जन्म-नाशादिकी योजना—युक्ति है। तात्पर्य यह है कि परमार्थतः धर्मोंका जन्म अथवा नाश होना सम्भव नहीं है ॥५९॥ |