माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished301 पृष्ठ
पृष्ठ 256, कुल 301 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 256
| २३६ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
|---|
आत्माकी अनिर्वचनीयता
नाजेषु सर्वधर्मेषु शाश्वताशाश्वताभिधा ।
यत्र वर्णा न वर्तन्ते विवेकस्तत्र नोच्यते ॥ ६० ॥
इन सम्पूर्ण अजन्मा धर्मोंमें नित्य-अनित्य नामोंकी प्रवृत्ति नहीं है जहाँ शब्द ही नहीं है उस आत्मतत्त्वमें [नित्य-अनित्य] विवेक भी नहीं कहा जा सकता ॥ ६० ॥
| परमार्थतस्त्वात्मस्वजेषुनित्यैकरसविज्ञप्तिमात्रसत्ताकेषु शाश्वतोऽशाश्वत इति वा नाभिधा नाभिधानं प्रवर्तत इत्यर्थः । यत्र येषु वर्ण्यन्ते यैरर्थास्ते वर्णाः शब्दा न प्रवर्तन्तेऽभिधातुं प्रकाशयितुं न प्रवर्तन्त इत्यर्थः । इदमेवमिति विवेको विविक्तता तत्र नित्योऽनित्य इति नोच्यते । "यतो वाचो निवर्तन्ते" (तै० उ० २।४।१) इति श्रुतेः॥६०॥ | वास्तवमें तो नित्य एकरस विज्ञानमात्र सत्तास्वरूप अजन्मा आत्माओंमें नित्य-अनित्य-ऐसे अभिधान अर्थात् नामकी भी प्रवृत्ति नहीं है। जहाँ—जिन महात्माओंमें—जिनसे पदार्थोंका वर्णन किया जाता है वे वर्ण यानी शब्द भी नहीं हैं अर्थात् उसका वर्णन करनेके लिये प्रवृत्त नहीं होते हैं, उसमें 'यह ऐसा है अर्थात् नित्य है अथवा अनित्य है' इस प्रकारका विवेक भी नहीं कहा जाता; जैसा कि "जहाँ-से वाणी लौट आती है" इस श्रुति-से सिद्ध होता है ॥६०॥ |
यथा स्वप्ने द्वयाभासं चित्तं चलति मायया ।
तथा जाग्रद्द्वयाभासं चित्तं चलति मायया ॥ ६१ ॥
जिस प्रकार स्वप्नमें चित्त मायासे द्वैताभासरूपसे स्फुरित होता है उसी प्रकार जाग्रत्कालीन द्वैताभासरूपसे भी चित्त मायासे ही स्फुरित होता है ॥ ६१ ॥