भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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पृष्ठ 257

शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण २३७


अद्वयं च द्वयाभासं चित्तं स्वप्ने न संशयः ।

अद्वयं च द्वयाभासं तथा जाग्रन्न संशयः ॥ ६२ ॥

इसमें सन्देह नहीं, स्वप्नावस्थामें अद्वय चित्त ही द्वैतरूपसे भासनेवाला है; इसी प्रकार जाग्रत्कालमें भी अद्वय मन ही द्वैतरूपसे भासनेवाला है—इसमें कोई सन्देह नहीं ॥ ६२ ॥

यत्पुनर्वाग्गोचरत्वं परमार्थतोऽद्वयस्य विज्ञानमात्रस्य तन्मनसः स्पन्दनमात्रं न परमार्थत इति। उक्तार्थौ श्लोकौ ॥६१-६२॥परमार्थतः अद्वय विज्ञानमात्रका जो वाणीका विषय होना है वह मनका स्फुरणमात्र ही है, वह परमार्थतः है नहीं—इस प्रकार इन श्लोकोंकी व्याख्या पहले (अद्वैत० २९-३० में) की जा चुकी है ॥६१-६२॥

द्वैताभावमें स्वप्नका दृष्टान्त

इतश्च वाग्गोचरस्याभावो द्वैतस्य—वाणीके विषयभूत द्वैतका इसलिये भी अभाव है—

स्वप्नदृक्प्रचरन्स्वप्ने दिक्षु वै दशसु स्थितान् ।

अण्डजान्स्वेदजान्वापि जीवान्पश्यति यान्सदा ॥ ६३ ॥

स्वप्नद्रष्टा स्वप्नमें घूमते-घूमते दशों दिशाओंमें स्थित जिन अण्डज अथवा स्वेदज जीवोंको सर्वदा देखा करता है [ वे वस्तुतः उससे पृथक् नहीं होते ] ॥ ६३ ॥

खमान्पश्यतीति खमदृक्प्रचरन्पर्यटन्स्वप्ने खमस्थाने दिक्षु वै दशसु स्थितान्वर्तमानाञ्जीवान्प्राणिनोऽण्डजान्स्वेदजान्वा यान्सदा पश्यति ॥६३॥जो खमोंको देखता है उसे खमद्रष्टा कहते हैं, वह खम अर्थात् खमस्थानोंमें घूमता हुआ दशों दिशाओंमें स्थित जिन स्वेदज अथवा अण्डज प्राणियोंको सर्वदा देखता है [ वे वस्तुतः उससे भिन्न नहीं होते ] ॥ ६३ ॥