माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
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शां० भा० ] अशातशान्तिप्रकरण^[अलातशान्तिप्रकरण] २३९
जाग्रत्-अवस्थामें घूमते-घूमते जाग्रत्-अवस्थाका साक्षी दशों दिशाओंमें स्थित जिन अण्डज अथवा स्वेदज जीवोंको सर्वदा देखता है ॥ ६५ ॥ वे जाग्रच्चित्तके दृश्य उससे पृथक् नहीं हैं। इसी प्रकार वह जाग्रच्चित्त भी उसीका दृश्य माना जाता है ॥ ६६ ॥
| जाग्रतो दृश्या जीवास्तच्चित्ताव्यतिरिक्ताश्चित्तेक्षणीयत्वात्स्वप्नदृक्चित्तेक्षणीयजीववत् । तच्च जीवेक्षणात्मकं चित्तं द्रष्टुरव्यतिरिक्तं द्रष्टृदृश्यत्वात्स्वप्नचित्तवत्। उक्तार्थमन्यत् ॥ ६५-६६ ॥ | जाग्रत् पुरुषको दिखलायी देनेवाले जीव उसके चित्तसे अपृथक् हैं, क्योंकि स्वप्नद्रष्टाके चित्तसे देखे जानेवाले जीवोंके समान वे उसके चित्तसे ही देखे जाते हैं। तथा जीवोंको देखनेवाला वह चित्त भी द्रष्टासे अभिन्न है, क्योंकि स्वप्नचित्तके समान वह भी जाग्रद्दृष्टाका दृश्य है। शेष अर्थ पहले कहा जा चुका है ॥ ६५-६६ ॥ |
उभे ह्यन्योन्यदृश्ये ते किं तदस्तीति नोच्यते ।
लक्षणाशून्यमुभयं तन्मतेनैव गृह्यते ॥ ६७ ॥
वे [ जीव और चित्त ] दोनों एक दूसरेके दृश्य हैं; वे हैं क्या वस्तु—सो कहा नहीं जा सकता। वे दोनों ही प्रमाणशून्य हैं और केवल तच्चित्तताके कारण ही ग्रहण किये जाते हैं ॥ ६७ ॥
| जीवचित्ते उभे चित्तचैत्ये ते अन्योन्यदृश्ये इतरेतरगम्ये । जीवादिविषयापेक्षं हि चित्तं नाम भवति । चित्तापेक्षं हि जीवादि दृश्यम् । अतस्ते अन्योन्यदृश्ये । | जीव और चित्त अर्थात् चित्त और चित्तके विषय—ये दोनों ही अन्योन्यदृश्य अर्थात् एक-दूसरेके विषय हैं। जीवादि विषयकी अपेक्षासे चित्त है और चित्तकी अपेक्षासे जीवादि दृश्य । अतः वे एक-दूसरेके |