भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished301 पृष्ठ

पृष्ठ 260, कुल 301 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 260
२४०माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०
तस्मान्न किंचिदस्तीति चोच्यते चित्तं वा चित्तेक्षणीयं वा किं तदस्तीति विवेकिनोच्यते । न हि स्वप्ने हस्ती हस्तिचित्तं वा विद्यते तथेहापि विवेकिनामित्यभिप्रायः ।दृश्य हैं । इसलिये ऐसा प्रश्न होनेपर कि वे हैं क्या ? विवेकी लोग यही कहते हैं कि चित्त अथवा चित्तका दृश्य-इनमेंसे कोई भी वस्तु है नहीं । इससे उन विवेकी पुरुषोंका यही अभिप्राय है कि जिस प्रकार स्वप्नमें हाथी और हाथीको ग्रहणकरनेवाला चित्त नहीं होता उसी प्रकार यहाँ (जाग्रत्-अवस्थामें) भी उनका अभाव है ।
कथम् ? लक्षणाशून्यं लक्ष्यतेऽनेनेति लक्षणा प्रमाणं प्रमाणशून्यमुभयं चित्तं चैत्यं द्वयं यतस्तन्मतेनैव तच्चित्ततयैव तद्गृह्यते । न हि घटमतिं प्रत्याख्याय घटो गृह्यते नापि घटं प्रत्याख्याय घटमतिः । न हि तत्र प्रमाणप्रमेयभेदः शक्यते कल्पयितुमित्यभिप्रायः ॥६७॥किस प्रकार नहीं हैं ? क्योंकि वे चित्त और चैत्य दोनों ही लक्षणाशून्य-प्रमाणरहित हैं । जिससे कोई पदार्थ लक्षित होता है उसे 'लक्षणा' यानी 'प्रमाण' कहते हैं । और वे तन्मत-तच्चित्ततासे ही ग्रहण किये जाते हैं, क्योंकि न तो घटबुद्धिको त्यागकर घटका ही ग्रहण किया जाता है और न घटको त्यागकर घटबुद्धिका ही । तात्पर्य यह कि उनमें प्रमाण और प्रमेयके भेदकी कल्पना नहीं की जा सकती ॥६७॥

यथा स्वप्नमयो जीवो जायते म्रियतेऽपि च ।
तथा जीवा अमी सर्वे भवन्ति न भवन्ति च ॥ ६८ ॥

जिस प्रकार स्वप्नका जीव उत्पन्न होता है और मरता भी है उसी प्रकार ये सब जीव भी उत्पन्न होते हैं और मरते भी हैं ॥ ६८ ॥