माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
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शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण २४१
यथा मायामयो जीवो जायते म्रियतेऽपि च ।
तथा जीवा अमी सर्वे भवन्ति न भवन्ति च ॥ ६९ ॥
जिस प्रकार मायामय जीव उत्पन्न होता है और मरता भी है उसी प्रकार ये सब जीव उत्पन्न होते हैं और मरते भी हैं ॥ ६९ ॥
यथा निर्मितको जीवो जायते म्रियतेऽपि वा ।
तथा जीवा अमी सर्वे भवन्ति न भवन्ति च ॥ ७० ॥
जिस प्रकार मन्त्रादिसे रचा हुआ जीव उत्पन्न होता है और मरता भी है उसी प्रकार ये सब जीव उत्पन्न होते हैं और मरते भी हैं ॥७०॥
| मायामयो मायाविना यः कृतो निर्मितको मन्त्रौषध्यादि-भिर्निष्पादितः । खममायानि-र्मितका अण्डजादयो जीवा यथा जायन्ते म्रियन्ते च तथा मनु-ष्यादिलक्षणा अविद्यमाना एव चित्तविकल्पनामात्रा इत्यर्थः ॥ ६८—७० ॥ | मायामय—जिसे मायावीने रचा हो, निर्मितक—मन्त्र और ओषधि आदिसे सम्पादन किया हुआ । खप्न, माया और मन्त्रादिसे निष्पन्न हुए अण्डज आदि जीव जिस प्रकार उत्पन्न होते और मरते भी हैं उसी प्रकार मनुष्यादिरूप जीव वर्तमान होते हुए भी चित्तके विकल्पमात्र ही हैं—यह इसका अभिप्राय है ॥ ६८-७० ॥ |
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अजाति ही उत्तम सत्य है
न कश्चिज्जायते जीवः संभवोऽस्य न विद्यते ।
एतत्तदुत्तमं सत्यं यत्र किंचिन्न जायते ॥ ७१ ॥
३१—३२