भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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पृष्ठ 262
१४२माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०

[ वस्तुतः ] कोई जीव उत्पन्न नहीं होता, उसके जन्मकी सम्भावना ही नहीं है। उत्तम सत्य तो यही है कि जिसमें किसी वस्तुकी उत्पत्ति ही नहीं होती ॥ ७१ ॥

व्यवहारसत्यविषये जीवानां जन्ममरणादिः स्वप्नादिजीववदित्युक्तम् । उत्तमं तु परमार्थसत्यं न कश्चिज्जायते जीव इति । उक्तार्थमन्यत् ॥७१॥व्यावहारिक सत्तामें भी जीवोंके जो जन्म-मरणादि हैं वे स्वप्नादिके जीवोंके ही समान हैं—ऐसा पहले कहा जा चुका है; किन्तु उत्तम सत्य तो यही है कि कोई भी जीव उत्पन्न नहीं होता । शेष अंशकी व्याख्या पहले की जा चुकी है ॥७१॥

चित्तकी असंगता

चित्तस्पन्दितमेवेदं ग्राह्यग्राहकवद्द्वयम् ।
चित्तं निर्विषयं नित्यमसङ्गं तेन कीर्तितम् ॥ ७२ ॥

विषय और इन्द्रियोंके सहित यह सम्पूर्ण द्वैत चित्तका ही स्फुरण है; किन्तु चित्त निर्विषय है; इसीसे उसे नित्य असंग कहा गया है ॥७२॥

सर्वं ग्राह्यग्राहकवच्चित्तस्पन्दितमेव द्वयं चित्तं परमार्थत आत्मैवेति निर्विषयं तेन निर्विषयत्वेन नित्यमसङ्गं कीर्तितम् । "असङ्गो ह्ययं पुरुषः" ( बृ० उ० ४ । ३ । १५, १६) इति श्रुतेः। सविषयस्य हि विषये सङ्गः। निर्विषयत्वाच्चित्तमसङ्गमित्यर्थः ॥ ७२ ॥विषय और इन्द्रियोंसे युक्त सम्पूर्ण द्वैत चित्तका ही स्फुरण है । किन्तु चित्त परमार्थतः आत्मा ही है, इसलिये वह निर्विषय है । उस निर्विषयताके कारण उसे सर्वदा असंग कहा गया है; जैसा कि "यह पुरुष असंग ही है" इस श्रुतिसे प्रमाणित होता है। जो सविषय होता है उसीका अपने विषयसे संग हो सकता है । अतः तात्पर्य यह है कि निर्विषय होनेके कारण चित्त असंग है ॥७२॥