भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished301 पृष्ठ

पृष्ठ 263, कुल 301 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 263

शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण [ २४३


ननु निर्विषयत्वेन चेदसङ्गत्वं चित्तस्य न निःसङ्गता भवति यस्माच्छास्ता शास्त्रं शिष्यश्चेत्येवमादेर्विषयस्य विद्यमानत्वात् ।<br><br>नैष दोषः; कस्मात्—शंका— यदि निर्विषयताके कारण ही असंगता होती है तो चित्तकी असंगता तो नहीं हो सकती, क्योंकि शास्ता (गुरु), शास्त्र और शिष्य इत्यादि उसके विषय विद्यमान हैं।<br><br>समाधान— यह दोष नहीं हो सकता, क्योंकि—

व्यावहारिक वस्तु परमार्थतः नहीं होती

योऽस्ति कल्पितसंवृत्या परमार्थेन नास्त्यसौ ।
परतन्त्राभिसंवृत्या स्यान्नास्ति परमार्थतः ॥ ७३ ॥

जो पदार्थ कल्पित व्यवहारके कारण होता है वह परमार्थतः नहीं होता; और यदि अन्य मतावलम्बियोंके शास्त्रोंकी परिभाषाके अनुसार हो भी तो भी वह परमार्थतः नहीं हो सकता ॥७३॥

यः पदार्थः शास्त्रादिर्विद्यते स कल्पितसंवृत्या; कल्पिता च सा परमार्थप्रतिपत्त्युपायत्वेन संवृतिश्च सा, तया योऽस्ति परमार्थेन नास्त्यसौ न विद्यते । ज्ञाते द्वैतं न विद्यत इत्युक्तम् ।<br><br>यश्च परतन्त्राभिसंवृत्या परशास्त्रव्यवहारेण स्यात्पदार्थः सजो भी शास्त्रादि पदार्थ हैं वे कल्पित व्यवहारसे ही हैं; अर्थात् जिस व्यवहारकी परमार्थतत्त्वकी उपलब्धिके उपायरूपसे कल्पना की गयी है उसके कारण जिस पदार्थकी सत्ता है वह परमार्थसे नहीं है। “ज्ञान हो जानेपर द्वैत नहीं रहता” (आगम० श्लो० १८) ऐसा हम पहले कह ही चुके हैं।<br><br>इसके सिवा जो पदार्थ परतन्त्राभिसंवृतिसे—अन्य मतावलम्बियोंके शास्त्रव्यवहारसे सिद्ध है वह
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित) · पृष्ठ 263, कुल 301 में से · BharatKosha