भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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पृष्ठ 264
२४४माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०

परमार्थतो निरूप्यमाणो नास्त्येव। तेन युक्तमुक्तमसङ्गं तेन कीर्तितमिति ॥ ७३ ॥ | परमार्थतः निरूपण किये जानेपर नहीं है। अतः 'इसीसे उसे असङ्ग कहा गया है'—यह कथन ठीक ही है ॥ ७३ ॥

आत्मा अज है—यह कल्पना भी व्यावहारिक है

ननु शास्त्रादीनां संवृतित्वेऽज इतीयमपि कल्पना संवृतिः स्यात् ? | शंका—शास्त्रादिको व्यावहारिक माननेपर तो 'अज है' ऐसी कल्पना भी व्यावहारिक ही सिद्ध होगी ? सत्यमेवम् । | समाधान—हाँ, बात तो ऐसी ही है!

अजः कल्पितसंवृत्या परमार्थेन नाप्यजः ।
परतन्त्राभिनिष्पत्त्या संवृत्या जायते तु सः ॥ ७४ ॥

आत्मा 'अज' भी कल्पित व्यवहारके कारण ही कहा जाता है, परमार्थतः तो 'अज' भी नहीं है। अन्य मतावलम्बियोंके शास्त्रोंसे सिद्ध जो संवृति (भ्रमजनित व्यवहार) है उसके अनुसार उसका जन्म होता है । [ अतः उसका निषेध करनेके लिये ही उसे 'अज' कहा गया है ] ॥ ७४ ॥

शास्त्रादिकल्पितसंवृत्यैवाज इत्युच्यते । परमार्थेन नाप्यजः। यस्मात्परतन्त्राभिनिष्पत्त्या परशास्त्रसिद्धिमपेक्ष्य योऽज इत्युक्तः स संवृत्या जायते । अतोऽज इतीयमपि कल्पना परमार्थविषये नैव क्रमत इत्यर्थः ॥ ७४ ॥ | शास्त्रादिकल्पित व्यवहारके कारण ही उसे 'अज' ऐसा कहा जाता है। परमार्थतः तो वह अज भी नहीं है। क्योंकि यहाँ जिसे अन्य शास्त्रोंकी सिद्धिकी अपेक्षासे 'अज' ऐसा कहा है, वह संवृतिसे ही जन्म भी लेता है। अतः 'वह अज है' ऐसी कल्पनाका भी परमार्थराज्यमें प्रवेश नहीं हो सकता ॥७४॥