भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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पृष्ठ 265

शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण २४५


द्वैताभावसे जन्माभाव

यस्मादसद्विषयस्तस्मात्— । क्योंकि विषय असत् है, इसलिये—

अभूताभिनिवेशोऽस्ति द्वयं तत्र न विद्यते ।
द्वयाभावं स बुद्ध्वैव निर्निमित्तो न जायते ॥ ७५ ॥

लोगोंका असत्य [द्वैत] के विषयमें केवल आग्रह है । वहाँ [परमार्थतत्त्वमें] द्वैत है ही नहीं । जीव द्वैताभावका बोध प्राप्त करके ही, फिर कोई कारण न रहनेसे जन्म नहीं लेता ॥ ७५ ॥

[मिथ्याभिनिवेश-निवृत्त्या जन्माभावः] असत्यभूते द्वैतेऽभिनिवेशोऽस्ति केवलम्। अभिनिवेश आग्रहमात्रम् । द्वयं तत्र न विद्यते । मिथ्याभिनिवेशमात्रं च जन्मनः कारणं यस्मात्तस्माद्द्वयाभावं बुद्ध्वा निर्निमित्तो निवृत्तमिथ्याद्वयाभिनिवेशो यः स न जायते ॥ ७५ ॥असत्यभूत द्वैतमें लोगोंका केवल अभिनिवेश है । आग्रहमात्रका नाम अभिनिवेश है । वहाँ [परमार्थवस्तुमें] द्वैत है ही नहीं । क्योंकि मिथ्या अभिनिवेशमात्र ही जीवके जन्मका कारण है। अतः द्वैताभावको जानकर जो निर्निमित्त हो गया है अर्थात् जिसका मिथ्या द्वैतविषयक आग्रह निवृत्त हो गया है उस [अधिकारी जीव] का फिर जन्म नहीं होता ॥ ७५ ॥

यदा न लभते हेतूनुत्तमाधममध्यमान् ।
तदा न जायते चित्तं हेत्वभावे फलं कुतः ॥ ७६ ॥

जिस समय चित्त उत्तम, मध्यम और अधम हेतुओंको प्राप्त नहीं करता उस समय उसका जन्म भी नहीं होता; क्योंकि हेतुका अभाव होनेपर फिर फल कहाँ हो सकता है ? ॥ ७६ ॥