भारतकोश
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माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished301 पृष्ठ

शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण २४५


द्वैताभावसे जन्माभाव

यस्मादसद्विषयस्तस्मात्— । क्योंकि विषय असत् है, इसलिये—

अभूताभिनिवेशोऽस्ति द्वयं तत्र न विद्यते ।
द्वयाभावं स बुद्ध्वैव निर्निमित्तो न जायते ॥ ७५ ॥

लोगोंका असत्य [द्वैत] के विषयमें केवल आग्रह है । वहाँ [परमार्थतत्त्वमें] द्वैत है ही नहीं । जीव द्वैताभावका बोध प्राप्त करके ही, फिर कोई कारण न रहनेसे जन्म नहीं लेता ॥ ७५ ॥

[मिथ्याभिनिवेश-निवृत्त्या जन्माभावः] असत्यभूते द्वैतेऽभिनिवेशोऽस्ति केवलम्। अभिनिवेश आग्रहमात्रम् । द्वयं तत्र न विद्यते । मिथ्याभिनिवेशमात्रं च जन्मनः कारणं यस्मात्तस्माद्द्वयाभावं बुद्ध्वा निर्निमित्तो निवृत्तमिथ्याद्वयाभिनिवेशो यः स न जायते ॥ ७५ ॥असत्यभूत द्वैतमें लोगोंका केवल अभिनिवेश है । आग्रहमात्रका नाम अभिनिवेश है । वहाँ [परमार्थवस्तुमें] द्वैत है ही नहीं । क्योंकि मिथ्या अभिनिवेशमात्र ही जीवके जन्मका कारण है। अतः द्वैताभावको जानकर जो निर्निमित्त हो गया है अर्थात् जिसका मिथ्या द्वैतविषयक आग्रह निवृत्त हो गया है उस [अधिकारी जीव] का फिर जन्म नहीं होता ॥ ७५ ॥

यदा न लभते हेतूनुत्तमाधममध्यमान् ।
तदा न जायते चित्तं हेत्वभावे फलं कुतः ॥ ७६ ॥

जिस समय चित्त उत्तम, मध्यम और अधम हेतुओंको प्राप्त नहीं करता उस समय उसका जन्म भी नहीं होता; क्योंकि हेतुका अभाव होनेपर फिर फल कहाँ हो सकता है ? ॥ ७६ ॥

२४६माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०

| (हेतुत्रयाभावाज्जन्माभावः) <br> जात्याश्रमविहिता आशीर्व- <br> र्जितैरनुष्ठीयमाना <br> धर्मा देवत्वादि- <br> प्राप्तिहेतव उत्तमाः <br> केवलाश्च धर्माः। अधर्मव्यामिश्रा <br> मनुष्यत्वादिप्राप्त्यर्था मध्यमाः। <br> तिर्यगादिप्राप्तिनिमित्ता अधर्म- <br> लक्षणाः प्रवृत्तिविशेषाश्चाधमाः। <br> तानुत्तममध्यमाधमानविद्यापरि- <br> कल्पितान्यदै कमेवाद्वितीयमात्म- <br> तत्त्वं सर्वकल्पनावर्जितं जानन्न <br> लभते न पश्यति यथा बालैर्दृश्य- <br> मानं गगने मलं विवेकी न पश्यति <br> तद्वत्तदा न जायते नोत्पद्यते <br> चित्तं देवाद्याकारैरुत्तमाधम- <br> मध्यमफलरूपेण। न ह्यसति <br> हेतौ फलमुत्पद्यते बीजाद्यभाव <br> इव सस्यादि ॥७६॥ | निष्काम मनुष्योंद्वारा अनुष्ठान <br> किये जाते हुए देवत्वादिकी प्राप्तिके <br> हेतुभूत वर्णाश्रमविहित धर्म, जो <br> केवल धर्म ही हैं, उत्तम हेतु हैं और <br> मनुष्यत्वादिकी प्राप्तिके हेतुभूत जो <br> अधर्ममिश्रित धर्म हैं वे मध्यम हेतु हैं <br> तथा तिर्यगादि योनियोंकी प्राप्तिकी <br> हेतुभूत अधर्ममयी विशेष प्रवृत्तियाँ <br> अधम हेतु हैं। जिस समय सम्पूर्ण <br> कल्पनासे रहित एकमात्र अद्वितीय <br> आत्मतत्त्वका ज्ञान होनेपर उन उत्तम, <br> मध्यम और अधम हेतुओंको मनुष्य <br> इस प्रकार उपलब्ध नहीं करता, <br> जैसे कि विवेकी पुरुष आकाशमें <br> बालकोंको दिखायी देनेवाली <br> मलिनताको नहीं देखता, उस समय <br> चित्त उत्तम, मध्यम और अधम फल- <br> रूपसे देवादि शरीरोंमें उत्पन्न नहीं <br> होता। बीजादिके अभावमें जैसे <br> अन्नादि उत्पन्न नहीं होते उसी <br> प्रकार हेतुके न होनेपर फलकी भी <br> उत्पत्ति नहीं होती ॥ ७६ ॥ |


हेत्वभावे चित्तं नोत्पद्यत इति <br> युक्तम्। सा पुनरनुत्पत्तिश्चित्तस्य <br> कीदृशीत्युच्यते-हेतुका अभाव हो जानेपर चित्त <br> उत्पन्न नहीं होता—ऐसा पहले कहा <br> गया। किन्तु वह चित्तकी अनुत्पत्ति <br> कैसी होती है? इसपर कहा जाता है—

शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण २४७


अनिमित्तस्य चित्तस्य यानुत्पत्तिः समाद्वया ।

अजातस्यैव सर्वस्य चित्तदृश्यं हि तद्यतः ॥ ७७ ॥

[ इस प्रकार ] निमित्तशून्य चित्तकी जो अनुत्पत्ति है वह सर्वथा निर्विशेष और अद्वितीय है। [ क्योंकि पहले भी ] वह सर्वदा अजात [ अर्थात् अद्वितीय ] चित्तकी ही होती है, क्योंकि यह जो कुछ [ प्रतीयमान द्वैतवर्ग ] है, सब चित्तका ही दृश्य है ॥ ७७ ॥

परमार्थदर्शनेन निरस्तधर्माधर्माख्योत्पत्तिनिमित्तस्यानिमित्तस्य चित्तस्येति या मोक्षाख्यानुत्पत्तिः सा सर्वदा सर्वावस्थासु समा निर्विशेषाद्वया च । पूर्वमप्यजातस्यैवानुत्पन्नस्य चित्तस्य सर्वस्याद्वयस्येत्यर्थः । यस्मात्प्रागपि विज्ञानाच्चित्तदृश्यं तद्द्वयं जन्म च तस्मादजातस्य सर्वस्य सर्वदा चित्तस्य समाद्वयैवानुत्पत्तिर्न पुनः कदाचिद्भवति कदाचिद्वा न भवति। सर्वदैकरूपैवेत्यर्थः॥७७॥परमार्थज्ञानके द्वारा जिसका धर्माधर्मरूप उत्पत्तिका कारण निवृत्त हो गया है उस निमित्तशून्य चित्तकी जो मोक्षसंज्ञक अनुत्पत्ति है वह सर्वदा सब अवस्थाओंमें समान अर्थात् निर्विशेष और अद्वितीय है। वह पहलेसे ही अजात—अनुत्पन्न और सर्व अर्थात् अद्वय चित्तकी ही होती है। क्योंकि बोध होनेके पूर्व भी वह द्वैत और जन्म चित्तका ही दृश्य था अतः सम्पूर्ण अजात चित्तकी अनुत्पत्ति सर्वदा समान और अद्वय ही होती है। ऐसी नहीं है कि कभी होती है और कभी नहीं होती। तात्पर्य यह है कि वह सर्वदा एकरूपा ही है ॥ ७७ ॥

विद्वान्‌की अभयपदप्राप्ति

यथोक्तेन न्यायेन जन्मनिमित्तस्य द्वयस्याभावात्—उपर्युक्त न्यायसे जन्मके हेतुभूत द्वैतका अभाव होनेके कारण—
२४८माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०

बुद्ध्वानिमित्तां सत्यां हेतुं पृथगनाप्नुवन् ।
वीतशोकं तथाकाममभयं पदमश्नुते ॥ ७८ ॥

अनिमित्तताको ही सत्य जानकर और [ देवादि योनिकी प्राप्तिके ] किसी अन्य हेतुको न पाकर विद्वान् शोक और कामसे रहित अभयपद प्राप्त कर लेता है ॥ ७८ ॥

अनिमित्तां च सत्यां परमार्थरूपां बुद्ध्वा हेतुं धर्मादिकारणं देवादियोनिप्राप्तये पृथगनाप्नुवन्ननुपादानस्त्यक्तबाह्यैषणः सन्कामशोकादिवर्जितमविद्यादिरहितमभयं पदमश्नुते पुनर्न जायत इत्यर्थः ॥ ७८ ॥अनिमित्तताको ही सत्य यानी परमार्थरूप जानकर तथा देवादि योनियोंकी प्राप्तिके लिये किसी अन्य धर्मादि कारणको न पाकर [ विद्वान् ] बाह्य एषणाओंसे मुक्त हो कामना एवं शोकादिसे रहित अविद्याशून्य अभय-पदको प्राप्त कर लेता है; अर्थात् फिर जन्म नहीं लेता ॥७८॥

अभूताभिनिवेशाद्धि सदृशे तत्प्रवर्तते ।
वस्त्वभावं स बुद्ध्वैव निःसङ्गं विनिवर्तते ॥ ७९ ॥

चित्त असत्य [ द्वैत ] के अभिनिवेशसे ही तदनुरूप विषयोंमें प्रवृत्त होता है । तथा द्वैत वस्तुके अभावका बोध होनेपर ही वह उससे निःसंग होकर लौट आता है ॥ ७९ ॥

यस्मादभूताभिनिवेशादसति द्वये द्वयास्तित्वनिश्चयोऽभूताभिनिवेशस्तस्मादविद्याव्यामोहरूपाद्धि सदृशे तदनुरूपे तच्चित्तंक्योंकि अभूताभिनिवेशसे जो द्वैत वस्तुतः असत् है उसके अस्तित्वका निश्चय करना 'अभूताभिनिवेश' है—उस अविद्याजनित मोहरूप असत्याभिनिवेशके कारण ही चित्त तदनुरूप विषयोंमें प्रवृत्त होता है ।

शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण २४९


प्रवर्तते । तस्य द्वयस्य वस्तुनोऽभावं यदा बुद्धवांस्तदा तस्मान्निःसङ्गं निरपेक्षं सन्निवर्ततेऽमृषाभिनिवेशविषयात् ॥ ७९ ॥जिस समय वह उस द्वैत वस्तुका अभाव जान लेता है उस समय उस मिथ्या अभिनिवेशजनित विषयसे निःसंग-निरपेक्ष होकर लौट आता है ॥७९॥

मनोवृत्तियोंकी सन्धिमें ब्रह्मसाक्षात्कार

निवृत्तस्याप्रवृत्तस्य निश्चला हि तदा स्थितिः ।
विषयः स हि बुद्धानां तत्साम्यमजमद्वयम् ॥ ८० ॥

इस प्रकार [द्वैतसे] निवृत्त और [विषयान्तरमें] प्रवृत्त न हुए चित्तकी उस समय निश्चल स्थिति रहती है । वह परमार्थदर्शी पुरुषोंका ही विषय है और वही परम साम्य, अज और अद्वय है ॥ ८० ॥

निवृत्तस्य द्वैतविषयाद्विषयान्तरे चाप्रवृत्तस्याभावदर्शनेन चित्तस्य निश्चला चलनवर्जिता ब्रह्मस्वरूपैव तदा स्थितिः । यैषा ब्रह्मस्वरूपा स्थितिश्चित्तस्याद्वयविज्ञानैकरसघनलक्षणा, स हि यस्माद्विषयो गोचरः परमार्थदर्शिनां बुद्धानां तस्मात्तत्साम्यं परं निर्विशेषमजमद्वयं च ॥८०॥उस समय द्वैतविषयसे निवृत्त और विषयान्तरमें अप्रवृत्त चित्तकी अभावदर्शनके कारण निश्चल-चलनवर्जिता अर्थात् ब्रह्मस्वरूपा स्थिति रहती है । चित्तकी जो यह अद्वयविज्ञानैकरसघनरूपा ब्रह्ममयी स्थिति है वह, क्योंकि परमार्थदर्शी ज्ञानियोंका विषय-गोचर है इसलिये, परमसाम्य—निर्विशेष अज और अद्वय है ॥ ८० ॥

पुनरपि कीदृशश्चासौ बुद्धानां विषय इत्याह—वह ज्ञानियोंका विषय किस प्रकारका है? सो फिर भी बतलाते हैं—
२५०माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०

अजमनिद्रमस्वप्नं प्रभातं भवति स्वयम् ।
सकृद्विभातो ह्येवैष धर्मो धातुस्वभावतः ॥ ८१ ॥

वह अज, अनिद्र, अस्वप्न और स्वयंप्रकाश है। यह [आत्मा-नामक] धर्म अपने वस्तु-स्वभावसे ही नित्यप्रकाशमान है ॥८१॥

स्वयमेव तत्प्रभातं भवति, नादित्याद्यपेक्षम्; स्वयंज्योतिःस्वभावमित्यर्थः । सकृद्विभातः सदैव विभात इत्येतदेष एवंलक्षण आत्माख्यो धर्मो धातुस्वभावतो वस्तुस्वभावत इत्यर्थः ॥ ८१ ॥वह स्वयं ही प्रकाशित होता है—आदित्य आदिकी अपेक्षासे नहीं अर्थात् वह स्वयं प्रकाशस्वभाव है । यह ऐसे लक्षणोंवाला आत्मा नामक धर्म धातुस्वभाव-वस्तुस्वभावसे ही सकृद्विभात सदा भासमान है ॥८१॥

आत्माकी दुर्दर्शताका हेतु

एवमुच्यमानमपि परमार्थतत्त्वं कस्माल्लौकिकैर्न गृह्यत इत्युच्यते—इस प्रकार कहे जानेपर भी लौकिक पुरुषोंको इस परमार्थतत्त्वका बोध क्यों नहीं होता ? इसपर कहते हैं—

सुखमाव्रियते नित्यं दुःखं विव्रियते सदा ।
यस्य कस्य च धर्मस्य ग्रहेण भगवानसौ ॥ ८२ ॥

वे भगवान् जिस-तिस द्वैत वस्तुके आग्रहसे अनायास ही आच्छादित हो जाते हैं और सदा कठिनतासे प्रकट होते हैं ॥८२॥

यस्माद्यस्य कस्यचिद्द्वैतवस्तुनो धर्मस्य ग्रहेण ग्रहावेशेन मिथ्या-क्योंकि जिस-तिस धर्म—द्वैत वस्तुके ग्रहण—आग्रहसे मिथ्या-

शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण २५१


| भिनिविष्टतया सुखमाव्रियतेऽनायासेनाच्छाद्यत इत्यर्थः। द्वयोपलब्धिनिमित्तं हि तत्रावरणं न यत्नान्तरमपेक्षते । दुःखं च विव्रियते प्रकटीक्रियते, परमार्थज्ञानस्य दुर्लभत्वात् । भगवान्सावात्माद्वयो देव इत्यर्थः, अतो वेदान्तैराचार्यैश्च बहुश उच्यमानोऽपि नैव ज्ञातुं शक्य इत्यर्थः। "आश्चर्यो वक्ता कुशलोऽस्य लब्धा" (क० उ० १ । २ । ७) इति श्रुतेः॥ ८२॥ | भिनिवेशके कारण वे भगवान् अर्थात् अद्वय आत्मदेव सहज ही आवृत हो जाते हैं अर्थात् बिना आयासके ही आच्छादित हो जाते हैं—क्योंकि द्वैतोपलब्धिके निमित्तसे होनेवाला आवरण किसी अन्य यत्नकी अपेक्षा नहीं करता—और परमार्थज्ञान दुर्लभ होनेके कारण दुःखसे प्रकट किये जाते हैं; इसलिये वेदान्ताचार्योंके अनेक प्रकार निरूपण करनेपर भी जाननेमें नहीं आ सकते—यह इसका तात्पर्य है । "इसका वर्णन करनेवाला आश्चर्यरूप है तथा इसे ग्रहण करनेवाला भी कोई निपुण पुरुष ही होता है" इस श्रुतिसे भी यही सिद्ध होता है ॥ ८२ ॥ |


परमार्थका आवरण करनेवाले असदभिनिवेश

| अस्ति नास्तीत्यादिसूक्ष्मविषया अपि पण्डितानां ग्रहा भगवतः परमात्मन आवरणा एव किमुत मूढजनानां बुद्धिलक्षणा इत्येवमर्थं प्रदर्शयन्नाह— | अस्ति-नास्ति इत्यादि सूक्ष्मविषय भी, जो पण्डितोंके आग्रह हैं, भगवान् परमात्माके आवरण ही हैं, फिर मूर्ख लोगोंके बुद्धिरूप आग्रहोंकी तो बात ही क्या है ? इसी बातको दिखलाते हुए कहते हैं— |

अस्ति नास्त्यस्ति नास्तीति नास्ति नास्तीति वा पुनः।
चलस्थिरोभयाभावैरावृणोत्येव बालिशः ॥८३॥

२५२माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०

आत्मा है, नहीं है, है भी और नहीं भी है तथा नहीं है—नहीं है— इस प्रकार क्रमशः चल, स्थिर, उभयरूप और अभावरूप कोटियोंसे मूर्खलोग परमात्माको आच्छादित ही करते हैं ॥ ८३ ॥

अस्त्यात्मेति वादी कश्चित्प्रतिपद्यते । नास्तीत्यपरो वैनाशिकः । अस्ति नास्तीत्यपरोऽर्धवैनाशिकः सदसद्वादी दिग्वासाः । नास्ति नास्तीत्यत्यन्तशून्यवादी । तत्रास्तिभावश्चलः, घटाद्यनित्यविलक्षणत्वात् । नास्तिभावः स्थिरः सदाविशेषत्वात् । उभयं चलस्थिरविषयत्वात्सदसद्भावोऽभावोऽत्यन्ताभावः ।<br><br>प्रकारचतुष्टयस्यापि तैरेतैश्चलस्थिरोभयाभावैः सदसदादिवादी सर्वोऽपि भगवन्तमावृणोत्येव बालिशोऽविवेकी । यद्यपि पण्डितो बालिश एव परमार्थतत्त्वानवबोधात्किमु स्वभावमूढो जन इत्यभिप्रायः ॥ ८३ ॥कोई वादी कहता है—'आत्मा है'। दूसरा वैनाशिक कहता है—'नहीं है'। तीसरा अर्द्धवैनाशिक सदसद्वादी दिगम्बर कहता है—'है भी और नहीं भी है'। तथा अत्यन्त शून्यवादीका कथन है कि 'नहीं है—नहीं है'। इनमें अस्तिभाव 'चल' है, क्योंकि वह घट आदि अनित्य पदार्थोंसे भिन्न है। [तात्पर्य यह है कि घटादिका प्रमाता सुखादि विशेष धर्मोंसे युक्त होनेके कारण परिणामी—चल है]। सदा अविशेषरूप होनेसे नास्तिभाव 'स्थिर' है। चल और स्थिरविषयक होनेसे सदसद्भाव उभयरूप है तथा अभाव अत्यन्ताभावरूप है।<br><br>इन चल, स्थिर, चलस्थिर और अभावरूप चार प्रकारके भावोंसे सभी मूर्ख अर्थात् विवेकहीन सदसदादिवादीगण भगवान्‌को आच्छादित ही करते हैं। वे यद्यपि पण्डित हैं, तो भी परमार्थतत्त्वका ज्ञान न होनेके कारण मूर्ख ही हैं। अतः तात्पर्य यह है कि फिर स्वभावसे ही मूर्ख लोगोंकी तो बात ही क्या है? ॥ ८३ ॥

शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण २५३


कीदृक्पुनः परमार्थतत्त्वं यद्ब-बोधादवालिशः पण्डितो भवतीत्याह—तो फिर वह परमार्थतत्त्व कैसा है जिसका ज्ञान होनेपर मनुष्य अवालिश अर्थात् पण्डित हो जाता है ? इसपर कहते हैं—

कोट्यश्चतस्र एतास्तु ग्रहैर्यासां सदावृतः ।

भगवानाभिरस्पृष्टो येन दृष्टः स सर्वदृक् ॥ ८४ ॥

जिनके अभिनिवेशसे आत्मा सदा ही आवृत रहता है वे ये चार ही कोटियाँ हैं। इनसे असंस्पृष्ट (अछूते) भगवान्‌को जिसने देखा है वही सर्वज्ञ हैं ॥ ८४ ॥

[ चतुष्कोटिवर्जितात्मज्ञानस्य सार्वज्ञ्यकारणत्वम् ]

कोटयः प्रावादुकशास्त्रनिर्णयान्ता एता उक्ता अस्ति नास्तीत्याद्याश्चतस्रो यासां कोटीनां ग्रहैर्ग्रहणैरुपलब्धिनिश्चयैः सदा सर्वदावृत आच्छादितस्तेषामेव प्रावादुकानां यः स भगवानाभिरस्तिनास्तीत्यादिकोटिभिश्चतसृभिरप्यस्पृष्टोऽस्त्यादिविकल्पनावर्जित इत्येतद्येन मुनिना दृष्टो ज्ञातो वेदान्तेष्वौपनिषदः पुरुषः स सर्वदृक्सर्वज्ञः परमार्थपण्डित इत्यर्थः ॥ ८४ ॥उन प्रवाद करनेवाले वादियोंके शास्त्रोंद्वारा निर्णय की हुई ये अस्ति-नास्ति आदि चार ही कोटियाँ हैं। जिन कोटियोंके ग्रह-ग्रहणसे ही, अर्थात् उन प्रावादुकोंके इस उपलब्धि-जनित निश्चयसे ही जो भगवान् सदा आवृत है उसे जिस मुनिने इन अस्ति-नास्ति आदि चारों ही कोटियोंसे असंस्पृष्ट अर्थात् अस्ति-नास्ति आदि विकल्पसे सर्वदा रहित देखा है, यानी उसे वेदान्तोंमें [प्रतिपादित] औपनिषद पुरुषरूपसे जाना है वही सर्वदृक्—सर्वज्ञ अर्थात् परमार्थको जाननेवाला है ॥ ८४ ॥

ज्ञानीका नैष्कर्म्य

प्राप्य सर्वज्ञतां कृत्स्नां ब्राह्मण्यं पदमद्वयम् ।

अनापन्नादिमध्यान्तं किमतः परमीहते ॥ ८५ ॥

२५४माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०

इस पूर्ण सर्वज्ञता और आदि, मध्य एवं अन्तसे रहित अद्वितीय ब्राह्मण्य पदको पाकर भी क्या [ वह विवेकी पुरुष ] फिर कोई चेष्टा करता है ? ॥८५॥

प्राप्यैतां यथोक्तां कृत्स्नां समस्तां सर्वज्ञतां ब्राह्मण्यं पदं “स ब्राह्मणः” (बृ० उ० ३।८।१०) “एष नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य” (बृ० उ० ४।४।२३) इति श्रुतेः; आदिमध्यान्ता उत्पत्तिस्थिति-लया अनापन्ना अप्राप्ता यस्याद्व-यस्य पदस्य न विद्यन्ते तदना-पन्नादिमध्यान्तं ब्राह्मण्यं पदम्, तदेष प्राप्य लब्ध्वा किमतः परमस्मादात्मलाभादूर्ध्वमीहते चे-ष्टते निष्प्रयोजनमित्यर्थः । “नैव तस्य कृतेनार्थः” (गीता ३।१८) इत्यादिस्मृतेः ॥ ८५ ॥इस उपर्युक्त सम्पूर्ण सर्वज्ञता और “[ जो इस अक्षरको जानकर इस लोकसे जाता है ] वह ब्राह्मण है” “यह ब्राह्मणकी शाश्वती महिमा है” इत्यादि श्रुतियोंके अनुसार ब्राह्मण्यपदको प्राप्तकर—जिस अद्वय पदके आदि, मध्य और अन्त अर्थात् उत्पत्ति स्थिति और लय अनापन्न-अप्राप्त हैं अर्थात् नहीं हैं वह अनापन्नादिमध्यान्त ब्राह्मण्यपद है, उसीको पाकर इससे पीछे-इस आत्मलाभके अनन्तर कोई प्रयोजन न रहनेपर भी क्या [ वह विद्वान् ] कोई चेष्टा करता है ? [ अर्थात् नहीं करता ] जैसा कि “उसका किसी कार्यसे प्रयोजन नहीं रहता” इस स्मृतिसे प्रमाणित होता है ॥८५॥

विप्राणां विनयो ह्येष शमः प्राकृत उच्यते ।
दमः प्रकृतिदान्तत्वादेवं विद्वाञ्शमं व्रजेत् ॥ ८६ ॥

[ आत्मस्वरूपमें स्थित रहना ] यह उन ब्राह्मणोंका विनय है, यही उनका स्वाभाविक शम कहा जाता है तथा स्वभावसे ही दान्त ( जितेन्द्रिय ) होनेके कारण यही उनका दम भी है । इस प्रकार विद्वान् शान्तिको प्राप्त हो जाता है ॥ ८६ ॥

शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण २५५


विप्राणां ब्राह्मणानां विनयो विनीतत्वं स्वाभाविकं यदेतदात्मस्वरूपेणावस्थानम् । एष विनयः शमोऽप्येष एव प्राकृतः स्वाभाविकॊऽकृतक उच्यते। दमोऽप्येष एव प्रकृतिदान्तत्वात्स्वभावत एव चोपशान्तरूपत्वाद्ब्रह्मणः । एवं यथोक्तं स्वभावोपशान्तं ब्रह्म विद्वाञ्छममुपशान्तिं स्वाभाविकीं ब्रह्मस्वरूपां व्रजेद्ब्रह्मस्वरूपेणावतिष्ठत इत्यर्थः ॥ ८६ ॥ब्राह्मणोंका जो यह आत्मस्वरूपसे स्थित होनारूप विनय-विनीतत्व है वह स्वाभाविक है । उनका यह विनय और यही प्राकृत-स्वाभाविक अर्थात् अकृतक शम भी कहा जाता है । ब्रह्मस्वभावसे ही उपशान्तरूप है, अतः प्रकृतितः दान्त होनेके कारण यही उनका दम भी है। इस प्रकार उपर्युक्त स्वभावतः शान्त ब्रह्मको जाननेवाला पुरुष शम-ब्रह्मस्वरूपा स्वाभाविकी उपशान्तिको प्राप्त हो जाता है, अर्थात् ब्रह्मरूपसे स्थित हो जाता है ॥८६॥

त्रिविध ज्ञेय

एवमन्योन्यविरुद्धत्वात्संसारकारणानि रागद्वेषदोषास्पदानि प्रावादुकानां दर्शनानि । अतो मिथ्यादर्शनानि तानीति तद्युक्तिभिरेव दर्शयित्वा चतुष्कोटिवर्जितत्वाद्रागादिदोषानास्पदं स्वभावशान्तमद्वैतदर्शनमेव सम्यग्दर्शनमित्युपसंहृतम् । अथेfieldदानीं स्वप्रक्रियाप्रदर्शनार्थ आरम्भः—इस प्रकार एक-दूसरेसे विरुद्ध होनेके कारण प्रावादुकों (वादियों) के दर्शन संसारके कारणस्वरूप राग-द्वेषादि दोषोंके आश्रय हैं। अतः वे मिथ्या दर्शन हैं—यह बात उन्हींकी युक्तियोंसे दिखलाकर चारों कोटियोंसे रहित होनेके कारण रागादि दोषोंका अनाश्रयभूत स्वभावतः शान्त अद्वैतदर्शन ही सम्यग्दर्शन है—इस प्रकार उपसंहार किया गया। अब यहाँसे अपनी प्रक्रिया दिखलानेके लिये आरम्भ किया जाता है—

२५६ माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०


सवस्तु सोपलम्भं च द्वयं लौकिकमिष्यते । अवस्तु सोपलम्भं च शुद्धं लौकिकमिष्यते ॥ ८७ ॥

वस्तु और उपलब्धि दोनोंके सहित जो द्वैत है उसे लौकिक (जाग्रत्) कहते हैं तथा जो द्वैत वस्तुके बिना केवल उपलब्धिके सहित है उसे शुद्ध लौकिक (स्वप्न) कहते हैं ॥ ८७ ॥

लौकिकम्सवस्तु संवृतिसता वस्तुना सह वर्तत इति सवस्तु, तथा चोपलब्धिरुपलम्भस्तेन सह वर्तत इति सोपलम्भं च शास्त्रादिसर्वव्यवहारास्पदं ग्राह्यग्राहकलक्षणं द्वयं लौकिकं लोकादनपेतं लौकिकं जागरितमित्येतत् । एवंलक्षणं जागरितमिष्यते वेदान्तेषु ।
शुद्धलौकिकम्अवस्तु संवृतेरप्यभावात् । सोपलम्भं वस्तुवदुपलम्भनमुपलम्भोऽसत्यपि वस्तुनि तेन सह वर्तत इति सोपलम्भं च । शुद्धं केवलं प्रविभक्तं जागरितात्स्थूलाल्लौकिकं सर्वप्राणिसाधारणत्वादित्येतत् स्वप्न इत्यर्थः ॥८७॥

शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण २५७


अवस्त्वनुपलम्भं च लोकोत्तरमिति स्मृतम् ।

ज्ञानं ज्ञेयं च विज्ञेयं सदा बुद्धैः प्रकीर्तितम् ॥ ८८ ॥

जो वस्तु और उपलब्धि दोनोंसे रहित है वह अवस्था लोकोत्तर (सुषुप्ति) मानी गयी है। इस प्रकार विद्वानोंने सर्वदा ही [अवस्थात्रयरूप] ज्ञान और ज्ञेय तथा [तुरीयरूप] विज्ञेयका निरूपण किया है ॥८८॥


संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
अवस्त्वनुपलम्भं च ग्राह्यग्रहणवर्जितमित्येतत्, लोकोत्तरम् अत एव लोकातीतम् । ग्राह्यग्रहणविषयो हि लोकस्तदभावात्सर्वप्रवृत्तिबीजं सुषुप्तमित्येतदेवं स्मृतम्<br><br>सोपायं परमार्थतत्त्वं लौकिकं शुद्धलौकिकं लोकोत्तरं च क्रमेण येन ज्ञानेन ज्ञायते तज्ज्ञानम् । ज्ञेयमेतान्येव त्रीणि । एतद्व्यतिरेकेण ज्ञेयानुपपत्तेः सर्वप्रावादुककल्पितवस्तुनोऽत्रैवान्तर्भावात् । विज्ञेयं परमार्थसत्यं तुर्याख्यमद्वयमजमात्मतत्त्वमित्यर्थः । सदाअवस्तु और अनुपलब्भ अर्थात् ग्राह्य और ग्रहणसे रहित जो अवस्था है वह 'लोकोत्तर' अतएव 'लोकातीत' कहलाती है, क्योंकि ग्राह्य और ग्रहणका विषय ही लोक है। उसका अभाव होनेके कारण वह सुषुप्त अवस्था सम्पूर्ण प्रवृत्तियोंकी बीजभूता है—ऐसा माना गया है ।<br><br>उपायके सहित परमार्थतत्त्व तथा लौकिक, शुद्ध लौकिक और लोकोत्तर अवस्थाओंका जिस ज्ञानके द्वारा क्रमशः बोध होता है उसे 'ज्ञान' कहते हैं तथा ये तीनों अवस्थाएँ ही 'ज्ञेय' हैं, क्योंकि समस्त वादियोंकी कल्पना की हुई वस्तुओंका इन्हींमें अन्तर्भाव होनेके कारण इनके सिवा किसी अन्य ज्ञेयका होना सम्भव नहीं है । जो परमार्थ सत्य तुरीयसंज्ञक अद्वय अजन्मा आत्मतत्त्व है वही 'विज्ञेय' है । ऐसा इसका अभिप्राय है ।
२५८माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०
सर्वदा एतल्लौकिकादिविज्ञेयान्तं बुद्धैः परमार्थदर्शिभिर्ब्रह्मविद्भिः प्रकीर्तितम् ॥ ८८ ॥उन लौकिकसे लेकर विज्ञेयपर्यन्त सम्पूर्ण वस्तुओंका परमार्थदर्शी विद्वानोंने सदा—सर्वदा ही निरूपण किया है ॥ ८८ ॥

त्रिविध ज्ञेय और ज्ञानका ज्ञाता सर्वज्ञ है

ज्ञाने च त्रिविधे ज्ञेये क्रमेण विदिते स्वयम् ।
सर्वज्ञता हि सर्वत्र भवतीह महाधियः ॥ ८९ ॥

ज्ञान और तीन प्रकारके ज्ञेयको क्रमशः जान लेनेपर इसलोकमें उस महाबुद्धिमान्‌को स्वयं ही सर्वत्र सर्वज्ञता हो जाती है ॥ ८९ ॥

ज्ञाने च लौकिकादिविषये, ज्ञेये च लौकिकादौ त्रिविधे— पूर्वं लौकिकं स्थूलम्, तदभावेन पश्चाच्छुद्धं लौकिकम्, तदभावेन लोकोत्तरमित्येवं क्रमेण स्थानत्रयाभावेन परमार्थसत्ये तुर्येऽद्वयेऽजेऽभये विदिते स्वयमेवात्मस्वरूपमेव सर्वज्ञता सर्वश्चासौ ज्ञश्च सर्वज्ञस्तद्भावः सर्वज्ञता, इहास्मिँल्लोके भवति महाधियो महाबुद्धेः । सर्वलोकातिशयवस्तुविषयबुद्धित्वादेवंविदः सर्वत्रलौकिकादिविषयक ज्ञान और लौकिकादि तीन प्रकारके ज्ञेयको जान लेनेपर, अर्थात् पहले स्थूल लौकिकको, फिर उसके अभावमें शुद्ध लौकिकको तथा उसके भी अभावमें लोकोत्तरको—इस प्रकार क्रमशः तीनों अवस्थाओंके अभाव-द्वारा परमार्थसत्य अद्वय, अजन्मा और अभयरूप तुरीयको जान लेनेपर, इस लोकमें उस महाबुद्धिको सर्वत्र यानी सर्वदा स्वयं आत्मस्वरूप ही सर्वज्ञता—जो सर्वरूप ज्ञ (ज्ञानी) हो उसे 'सर्वज्ञ' कहते हैं उसीकी भावरूपा सर्वज्ञता प्राप्त होती है, क्योंकि ऐसा जाननेवालेकी बुद्धि सम्पूर्ण लोकसे बढ़ी हुई वस्तुको विषय करनेवाली होती है । तात्पर्य

शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण २५९


सर्वदा भवति । सकृद्विदिते स्वरूपे व्यभिचाराभावादित्यर्थः ।<br><br>न हि परमार्थविदो ज्ञानोद्भवाभिभवौ स्तो यथाऽन्येषां प्रावादुकानाम् ॥ ८९ ॥यह है कि स्वरूपका एक बार ज्ञान हो जानेपर उसका कभी व्यभिचार न होनेके कारण [ उसकी सर्वज्ञता सर्वदा रहती है ], क्योंकि जिस प्रकार अन्य वादियोंके ज्ञानके उदय और अस्त होते रहते हैं उस प्रकार परमार्थवेत्ता ज्ञानीके ज्ञानके उदय और अस्त नहीं होते ॥ ८९ ॥

लौकिकादीनां क्रमेण ज्ञेयत्वेन निर्देशादस्तित्वाशङ्का परमार्थतो मा भूदित्याह—[ उपर्युक्त श्लोकमें ] लौकिकादिको क्रमशः ज्ञेयरूपसे बतलाये जानेके कारण उनके परमार्थतः अस्तित्वकी आशंका न हो जाय—इसलिये कहते हैं—

हेयज्ञेयाप्यपाक्यानि विज्ञेयान्यग्रयाणतः ।
तेषामन्यत्र विज्ञेयादुपलम्भस्त्रिषु स्मृतः ॥ ९० ॥

[ जाग्रदादि ] हेय, [ सत्यब्रह्मस्वरूप ] ज्ञेय, [ पाण्डित्यादि ] प्राप्तव्य साधन और [ राग-द्वेषादि ] प्रशमनीय दोष—ये सबसे पहले जानने योग्य हैं । इनमेंसे ज्ञेय (ब्रह्म) को छोड़कर शेष तीनोंमें तो केवल उपलम्भ ( अविद्याकल्पितत्व ) ही माना गया है ॥ ९० ॥

हेयानि च लौकिकादीनि त्रीणि जागरितस्वप्नसुषुप्तान्यात्मन्यसत्त्वेन रज्ज्वां सर्पवद्द्वातव्यानीत्यर्थः । ज्ञेयमिह चतुष्कोटि-लौकिकादि तीन हेय हैं । तात्पर्य यह है कि जागरित, स्वप्न और सुषुप्ति ये तीनों अवस्थाएँ रज्जुमें सर्पके समान आत्मामें असत् होनेके कारण त्यागने योग्य हैं । चारों कोटियोंसे रहित परमार्थतत्त्व

२६० माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०


वर्जितं परमार्थतत्त्वम् । आप्या-
न्याप्तव्यानीत्यक्तवाह्यैषणात्रयेण
भिक्षुणा पाण्डित्यबाल्यमौना-
ख्यानि साधनानि । पाक्यानि
रागद्वेषमोहादयो दोषाः कषाया-
ख्यानि पक्तव्यानि । सर्वाण्ये-
तानि हेयज्ञेयाप्यपाक्यानि विज्ञे-
यानि भिक्षुणोपायत्वेनेत्यर्थः,
अग्रयाणतः प्रथमतः ।

तेषां हेयादीनामन्यत्र विज्ञे-
यात्परमार्थसत्यं विज्ञेयं ब्रह्मैकं
वर्जयित्वा, उपलम्भमुपल-
म्भोऽविद्याकल्पनामात्रम् । हेया-
प्यपाक्येषु त्रिष्वपि स्मृतो ब्रह्म-
विद्भिर्न परमार्थसत्यता त्रयाणा-
मित्यर्थः ॥ ९० ॥

ही यहाँ ज्ञेय माना गया है । बाह्य तीनों एषणाओंको त्याग देनेवाले मुमुक्षुके लिये पाण्डित्य, बाल्य और मौन नामक तीन साधन ही आप्य—प्राप्तव्य हैं; तथा राग, द्वेष और मोह आदि कषायसंज्ञक दोष ही [उसके लिये] पाक्य—पाक (जीर्ण) करने योग्य हैं। तात्पर्य यह है कि मुमुक्षुको हेय, ज्ञेय, आप्य और पाक्य इन सबको ही अग्रयाणतः—सबसे पहले अपने साधनरूपसे जानना चाहिये ।

उन हेय आदिमेंसे केवल एक परमार्थ सत्य ज्ञेय ब्रह्मको छोड़कर शेष हेय, आप्य और पाक्य—इन तीनोंमें ब्रह्मवेत्ताओंने केवल उपलम्भ—उपलम्भन यानी अविद्यामय कल्पनामात्र ही माना है, अर्थात् इन तीनोंकी परमार्थ सत्यता स्वीकार नहीं की है ॥ ९० ॥


जीव आकाशके समान अनादि और अभिन्न हैं

परमार्थतस्तु—
वास्तवमें तो—

प्रकृत्याकाशवज्ज्ञेयाः सर्वे धर्मा अनादयः ।
विद्यते न हि नानात्वं तेषां क्वचन किंचन ॥ ९१ ॥

सम्पूर्ण जीवोंको स्वभावसे ही आकाशके समान और अनादि जानना चाहिये । उनका नानात्व कहीं कुछ भी नहीं है ॥ ९१ ॥

शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण २६१


प्रकृत्या स्वभावत आकाश-वदाकाशतुल्याः सूक्ष्मनिरञ्जन-सर्वगतत्वैः सर्वे धर्मा आत्मानो ज्ञेया मुमुक्षुभिरनादयो नित्याः। बहुवचनकृतभेदाशङ्कां निरा-कुर्वन्नाह—क्वचन किंचन किंचि-दणुमात्रमपि तेषां न विद्यते नानात्वमिति ॥ ९१ ॥मुमुक्षुओंको सूक्ष्मत्व, निरञ्जनत्व और सर्वगतत्व आदिके कारण सभी धर्मों—जीवोंको प्रकृतिसे अर्थात् स्वभावतः आकाशवत्—आकाशके समान और अनादि यानी नित्य जानना चाहिये । यहाँ बहुवचनके कारण होनेवाले जीवात्माओंके भेदकी आशंकाका निराकरण करते हुए कहते हैं— 'उनका क्वचन—कहीं, किञ्चन—कुछ भी अर्थात् अणुमात्र भी नानात्व नहीं है' ॥ ९१ ॥

आत्मतत्त्वनिरूपण

ज्ञेयतापि धर्माणां संवृत्यैव न परमार्थत इत्याह—आत्माओंकी जो ज्ञेयता है वह भी व्यावहारिक ही है परमार्थतः नहीं—इसी अभिप्रायसे कहते हैं—

आदिबुद्धाः प्रकृत्यैव सर्वे धर्माः सुनिश्चिताः ।
यस्यैवं भवति क्षान्तिः सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥ ९२ ॥

सम्पूर्ण आत्मा स्वभावसे ही नित्य बोधस्वरूप और सुनिश्चित हैं—जिसे ऐसा समाधान हो जाता है वह अमरत्व ( मोक्ष ) प्राप्तिमें समर्थ होता है ॥ ९२ ॥

यस्मादादौ बुद्धा आदिबुद्धाः प्रकृत्यैव स्वभावत एव यथा नित्यप्रकाशस्वरूपः सवितैवं नित्यबोधस्वरूपा इत्यर्थः सर्वे धर्माः सर्व आत्मानः । न चक्योंकि जिस प्रकार सूर्य नित्य प्रकाशस्वरूप है उसी प्रकार सम्पूर्ण धर्म यानी आत्मा प्रकृति—स्वभावसे ही आदिबुद्ध—आरम्भमें ही जाने हुए अर्थात् नित्य बोधस्वरूप हैं। उनका
२६२माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०

तेषां निश्चयः कर्त्तव्यो नित्य-निश्चितस्वरूपा इत्यर्थः। न संदिह्यमानस्वरूपा एवं नैवं चेति।|निश्चय भी नहीं करना है; अर्थात् वे नित्यनिश्चितस्वरूप हैं—'ऐसे हैं अथवा नहीं हैं' इस प्रकार सन्दिग्धस्वरूप नहीं हैं। यस्य मुमुक्षोरेवं यथोक्तप्रकारेण सर्वदा बोधनिश्चयनिरपेक्षतात्मार्थं परार्थं वा यथा सविता नित्यं प्रकाशान्तरनिरपेक्षः स्वार्थं परार्थं चेत्येवं भवति क्षान्तिबोधकर्त्तव्यतानिरपेक्षता सर्वदा स्वात्मनि सोऽमृतत्वायामृतभावाय कल्पते मोक्षाय समर्थो भवतीत्यर्थः ॥९२॥|जिस मुमुक्षुको इस तरह—उपर्युक्त प्रकारसे अपने अथवा पराये-लिये सर्वदा बोधनिश्चय-सम्बन्धिनी निरपेक्षता है; जिस प्रकार सूर्य अपने अथवा पराये लिये सदा ही प्रकाशान्तरकी अपेक्षा नहीं करता उसी प्रकार जिसे सर्वदा अपने आत्मामें क्षान्ति-बोधकर्त्तव्यताकी निरपेक्षता रहती है वह अमृतत्व-अमृतभाव अर्थात् मोक्षके लिये समर्थ होता है ॥९२॥


तथा नापि शान्तिकर्त्तव्यतात्मनीत्याह—|इसी प्रकार आत्मामें शान्तिकर्त्तव्यता भी नहीं है—इसी आशयसे कहते हैं—

आदिशान्ता ह्यनुत्पन्नाः प्रकृत्यैव सुनिर्वृताः ।
सर्वे धर्माः समाभिन्ना अजं साम्यं विशारदम् ॥ ९३ ॥

सम्पूर्ण आत्मा नित्यशान्त, अजन्मा, स्वभावसे ही अत्यन्त उपरत तथा सम और अभिन्न हैं। [इस प्रकार क्योंकि] आत्मतत्त्व अज, समतारूप और विशुद्ध है [इसलिये उसकी शान्ति अथवा मोक्ष कर्तव्य नहीं है] ॥९३॥

शां०भा० ]अलातशान्तिप्रकरण२६३
यस्मादादिशान्ता नित्यमेव शान्ता अनुत्पन्ना अजाश्च प्रकृत्यैव सुनिर्वृताः सुष्टूपरतस्वभावा इत्यर्थः, सर्वे धर्माः समाश्चाभिन्नाश्च समाभिन्नाः, अजं साम्यं विशारदं विशुद्धमात्मतत्त्वं यस्मात्तस्माच्छान्तिर्मोक्षो वा नास्ति कर्तव्य इत्यर्थः, न हि नित्यैकस्वभावस्य कृतं किंचिदर्थवत्स्यात् ॥ ९३ ॥क्योंकि सम्पूर्ण धर्म आदिशान्त-सर्वदा ही शान्तस्वरूप, अनुत्पन्न-अजन्मा, स्वभावसे ही सुनिर्वृत अर्थात् अत्यन्त उपरत स्वभाववाले हैं; तथा सम और अभिन्न हैं; इस प्रकार, क्योंकि आत्मतत्त्व अजन्मा, समतारूप और विशुद्ध है इसलिये उसकी शान्ति अथवा मोक्ष कर्तव्य नहीं है—यह इसका अभिप्राय है, क्योंकि उस नित्य एकस्वभावके लिये कुछ भी करना सार्थक नहीं हो सकता ॥ ९३ ॥

आत्मज्ञ ही अकृपण हैं

ये यथोक्तं परमार्थतत्त्वं प्रतिपन्नास्ते एवाकृपणा लोके कृपणा एवान्य इत्याह—जो लोग उपर्युक्त परमार्थतत्त्वको समझते हैं लोकमें वे ही अकृपण हैं, उनके सिवा और सब तो कृपण ही हैं—इसी भावको लेकर कहते हैं—

वैशारद्यं तु वै नास्ति भेदे विचरतां सदा ।
भेदनिम्नाः पृथग्वादास्तस्मात्ते कृपणाः स्मृताः ॥ ९४ ॥

जो लोग सर्वदा भेदमें ही विचरते रहते हैं, निश्चय ही उनकी विशुद्धि नहीं होती । द्वैतवादी लोग भेदकी ही ओर प्रवृत्त होनेवाले हैं; इसलिये वे कृपण ( दीन ) माने गये हैं ॥९४॥

२६४ माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०


यस्माद्भेदनिष्ठा भेदानुयायिनः संसारानुगा इत्यर्थः, के? पृथग्वादाः पृथङ्नाना वस्तुत्वत्येवं वदनं येषां ते पृथग्वादा द्वैतिन इत्यर्थः, तस्मात्ते कृपणाः क्षुद्राः स्मृताः; यस्माद्वैशारद्यं विशुद्धिर्नास्ति तेषां भेदे विचरतां द्वैतमार्गेऽविद्याकल्पिते सर्वदा वर्तमानानामित्यर्थः । अतो युक्तमेव तेषां कार्पण्यमित्यभिप्रायः ॥ ९४ ॥क्योंकि वे भेदनिष्ठ-भेदानुयायी अर्थात् संसारके अनुगामी हैं, कौन लोग ? पृथक्वादी—'पृथक् अर्थात् नाना वस्तु है'—ऐसा जिनका कथन है वे पृथक्वादी अर्थात् द्वैतीलोग, इसलिये वे कृपण-क्षुद्र माने गये हैं; क्योंकि भेद अर्थात् अविद्यापरिकल्पित द्वैतमार्गमें सर्वदा विचरनेवाले उन लोगोंका वैशारद्य अर्थात् विशुद्धि नहीं होती । अतः उनका कृपण होना ठीक ही है—ऐसा इसका अभिप्राय है ॥ ९४ ॥

आत्मज्ञका महाज्ञानित्व

यदिदं परमार्थतत्त्वममहात्मभिरपण्डितैर्वेदान्तबहिःष्ठैः क्षुद्रैरल्पप्रज्ञैरनवगाह्यमित्याह—यह जो परमार्थतत्त्व है वह क्षुद्रचित्त अविवेकी तथा वेदान्तके अनधिकारी क्षुद्र और मन्दबुद्धि पुरुषोंकी समझमें नहीं आ सकता—इस आशयसे कहते हैं—

अजे साम्ये तु ये केचिद्भविष्यन्ति सुनिश्चिताः ।
ते हि लोके महाज्ञानास्तच्च लोको न गाहते ॥ ९५ ॥

जो कोई उस अज और साम्यरूप परमार्थतत्त्वमें अत्यन्त निश्चित होंगे वे ही लोकमें परम ज्ञानी हैं । उस तत्त्वका सामान्य लोक अवगाहन नहीं कर सकता ॥९५॥