भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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पृष्ठ 278
२५८माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०
सर्वदा एतल्लौकिकादिविज्ञेयान्तं बुद्धैः परमार्थदर्शिभिर्ब्रह्मविद्भिः प्रकीर्तितम् ॥ ८८ ॥उन लौकिकसे लेकर विज्ञेयपर्यन्त सम्पूर्ण वस्तुओंका परमार्थदर्शी विद्वानोंने सदा—सर्वदा ही निरूपण किया है ॥ ८८ ॥

त्रिविध ज्ञेय और ज्ञानका ज्ञाता सर्वज्ञ है

ज्ञाने च त्रिविधे ज्ञेये क्रमेण विदिते स्वयम् ।
सर्वज्ञता हि सर्वत्र भवतीह महाधियः ॥ ८९ ॥

ज्ञान और तीन प्रकारके ज्ञेयको क्रमशः जान लेनेपर इसलोकमें उस महाबुद्धिमान्‌को स्वयं ही सर्वत्र सर्वज्ञता हो जाती है ॥ ८९ ॥

ज्ञाने च लौकिकादिविषये, ज्ञेये च लौकिकादौ त्रिविधे— पूर्वं लौकिकं स्थूलम्, तदभावेन पश्चाच्छुद्धं लौकिकम्, तदभावेन लोकोत्तरमित्येवं क्रमेण स्थानत्रयाभावेन परमार्थसत्ये तुर्येऽद्वयेऽजेऽभये विदिते स्वयमेवात्मस्वरूपमेव सर्वज्ञता सर्वश्चासौ ज्ञश्च सर्वज्ञस्तद्भावः सर्वज्ञता, इहास्मिँल्लोके भवति महाधियो महाबुद्धेः । सर्वलोकातिशयवस्तुविषयबुद्धित्वादेवंविदः सर्वत्रलौकिकादिविषयक ज्ञान और लौकिकादि तीन प्रकारके ज्ञेयको जान लेनेपर, अर्थात् पहले स्थूल लौकिकको, फिर उसके अभावमें शुद्ध लौकिकको तथा उसके भी अभावमें लोकोत्तरको—इस प्रकार क्रमशः तीनों अवस्थाओंके अभाव-द्वारा परमार्थसत्य अद्वय, अजन्मा और अभयरूप तुरीयको जान लेनेपर, इस लोकमें उस महाबुद्धिको सर्वत्र यानी सर्वदा स्वयं आत्मस्वरूप ही सर्वज्ञता—जो सर्वरूप ज्ञ (ज्ञानी) हो उसे 'सर्वज्ञ' कहते हैं उसीकी भावरूपा सर्वज्ञता प्राप्त होती है, क्योंकि ऐसा जाननेवालेकी बुद्धि सम्पूर्ण लोकसे बढ़ी हुई वस्तुको विषय करनेवाली होती है । तात्पर्य
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