माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
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शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण २५७
अवस्त्वनुपलम्भं च लोकोत्तरमिति स्मृतम् ।
ज्ञानं ज्ञेयं च विज्ञेयं सदा बुद्धैः प्रकीर्तितम् ॥ ८८ ॥
जो वस्तु और उपलब्धि दोनोंसे रहित है वह अवस्था लोकोत्तर (सुषुप्ति) मानी गयी है। इस प्रकार विद्वानोंने सर्वदा ही [अवस्थात्रयरूप] ज्ञान और ज्ञेय तथा [तुरीयरूप] विज्ञेयका निरूपण किया है ॥८८॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अवस्त्वनुपलम्भं च ग्राह्यग्रहणवर्जितमित्येतत्, लोकोत्तरम् अत एव लोकातीतम् । ग्राह्यग्रहणविषयो हि लोकस्तदभावात्सर्वप्रवृत्तिबीजं सुषुप्तमित्येतदेवं स्मृतम् ।<br><br>सोपायं परमार्थतत्त्वं लौकिकं शुद्धलौकिकं लोकोत्तरं च क्रमेण येन ज्ञानेन ज्ञायते तज्ज्ञानम् । ज्ञेयमेतान्येव त्रीणि । एतद्व्यतिरेकेण ज्ञेयानुपपत्तेः सर्वप्रावादुककल्पितवस्तुनोऽत्रैवान्तर्भावात् । विज्ञेयं परमार्थसत्यं तुर्याख्यमद्वयमजमात्मतत्त्वमित्यर्थः । सदा | अवस्तु और अनुपलब्भ अर्थात् ग्राह्य और ग्रहणसे रहित जो अवस्था है वह 'लोकोत्तर' अतएव 'लोकातीत' कहलाती है, क्योंकि ग्राह्य और ग्रहणका विषय ही लोक है। उसका अभाव होनेके कारण वह सुषुप्त अवस्था सम्पूर्ण प्रवृत्तियोंकी बीजभूता है—ऐसा माना गया है ।<br><br>उपायके सहित परमार्थतत्त्व तथा लौकिक, शुद्ध लौकिक और लोकोत्तर अवस्थाओंका जिस ज्ञानके द्वारा क्रमशः बोध होता है उसे 'ज्ञान' कहते हैं तथा ये तीनों अवस्थाएँ ही 'ज्ञेय' हैं, क्योंकि समस्त वादियोंकी कल्पना की हुई वस्तुओंका इन्हींमें अन्तर्भाव होनेके कारण इनके सिवा किसी अन्य ज्ञेयका होना सम्भव नहीं है । जो परमार्थ सत्य तुरीयसंज्ञक अद्वय अजन्मा आत्मतत्त्व है वही 'विज्ञेय' है । ऐसा इसका अभिप्राय है । |