भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण २५९


सर्वदा भवति । सकृद्विदिते स्वरूपे व्यभिचाराभावादित्यर्थः ।<br><br>न हि परमार्थविदो ज्ञानोद्भवाभिभवौ स्तो यथाऽन्येषां प्रावादुकानाम् ॥ ८९ ॥यह है कि स्वरूपका एक बार ज्ञान हो जानेपर उसका कभी व्यभिचार न होनेके कारण [ उसकी सर्वज्ञता सर्वदा रहती है ], क्योंकि जिस प्रकार अन्य वादियोंके ज्ञानके उदय और अस्त होते रहते हैं उस प्रकार परमार्थवेत्ता ज्ञानीके ज्ञानके उदय और अस्त नहीं होते ॥ ८९ ॥

लौकिकादीनां क्रमेण ज्ञेयत्वेन निर्देशादस्तित्वाशङ्का परमार्थतो मा भूदित्याह—[ उपर्युक्त श्लोकमें ] लौकिकादिको क्रमशः ज्ञेयरूपसे बतलाये जानेके कारण उनके परमार्थतः अस्तित्वकी आशंका न हो जाय—इसलिये कहते हैं—

हेयज्ञेयाप्यपाक्यानि विज्ञेयान्यग्रयाणतः ।
तेषामन्यत्र विज्ञेयादुपलम्भस्त्रिषु स्मृतः ॥ ९० ॥

[ जाग्रदादि ] हेय, [ सत्यब्रह्मस्वरूप ] ज्ञेय, [ पाण्डित्यादि ] प्राप्तव्य साधन और [ राग-द्वेषादि ] प्रशमनीय दोष—ये सबसे पहले जानने योग्य हैं । इनमेंसे ज्ञेय (ब्रह्म) को छोड़कर शेष तीनोंमें तो केवल उपलम्भ ( अविद्याकल्पितत्व ) ही माना गया है ॥ ९० ॥

हेयानि च लौकिकादीनि त्रीणि जागरितस्वप्नसुषुप्तान्यात्मन्यसत्त्वेन रज्ज्वां सर्पवद्द्वातव्यानीत्यर्थः । ज्ञेयमिह चतुष्कोटि-लौकिकादि तीन हेय हैं । तात्पर्य यह है कि जागरित, स्वप्न और सुषुप्ति ये तीनों अवस्थाएँ रज्जुमें सर्पके समान आत्मामें असत् होनेके कारण त्यागने योग्य हैं । चारों कोटियोंसे रहित परमार्थतत्त्व