भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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पृष्ठ 280

२६० माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०


वर्जितं परमार्थतत्त्वम् । आप्या-
न्याप्तव्यानीत्यक्तवाह्यैषणात्रयेण
भिक्षुणा पाण्डित्यबाल्यमौना-
ख्यानि साधनानि । पाक्यानि
रागद्वेषमोहादयो दोषाः कषाया-
ख्यानि पक्तव्यानि । सर्वाण्ये-
तानि हेयज्ञेयाप्यपाक्यानि विज्ञे-
यानि भिक्षुणोपायत्वेनेत्यर्थः,
अग्रयाणतः प्रथमतः ।

तेषां हेयादीनामन्यत्र विज्ञे-
यात्परमार्थसत्यं विज्ञेयं ब्रह्मैकं
वर्जयित्वा, उपलम्भमुपल-
म्भोऽविद्याकल्पनामात्रम् । हेया-
प्यपाक्येषु त्रिष्वपि स्मृतो ब्रह्म-
विद्भिर्न परमार्थसत्यता त्रयाणा-
मित्यर्थः ॥ ९० ॥

ही यहाँ ज्ञेय माना गया है । बाह्य तीनों एषणाओंको त्याग देनेवाले मुमुक्षुके लिये पाण्डित्य, बाल्य और मौन नामक तीन साधन ही आप्य—प्राप्तव्य हैं; तथा राग, द्वेष और मोह आदि कषायसंज्ञक दोष ही [उसके लिये] पाक्य—पाक (जीर्ण) करने योग्य हैं। तात्पर्य यह है कि मुमुक्षुको हेय, ज्ञेय, आप्य और पाक्य इन सबको ही अग्रयाणतः—सबसे पहले अपने साधनरूपसे जानना चाहिये ।

उन हेय आदिमेंसे केवल एक परमार्थ सत्य ज्ञेय ब्रह्मको छोड़कर शेष हेय, आप्य और पाक्य—इन तीनोंमें ब्रह्मवेत्ताओंने केवल उपलम्भ—उपलम्भन यानी अविद्यामय कल्पनामात्र ही माना है, अर्थात् इन तीनोंकी परमार्थ सत्यता स्वीकार नहीं की है ॥ ९० ॥


जीव आकाशके समान अनादि और अभिन्न हैं

परमार्थतस्तु—
वास्तवमें तो—

प्रकृत्याकाशवज्ज्ञेयाः सर्वे धर्मा अनादयः ।
विद्यते न हि नानात्वं तेषां क्वचन किंचन ॥ ९१ ॥

सम्पूर्ण जीवोंको स्वभावसे ही आकाशके समान और अनादि जानना चाहिये । उनका नानात्व कहीं कुछ भी नहीं है ॥ ९१ ॥