माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
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शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण २४९
| प्रवर्तते । तस्य द्वयस्य वस्तुनोऽभावं यदा बुद्धवांस्तदा तस्मान्निःसङ्गं निरपेक्षं सन्निवर्ततेऽमृषाभिनिवेशविषयात् ॥ ७९ ॥ | जिस समय वह उस द्वैत वस्तुका अभाव जान लेता है उस समय उस मिथ्या अभिनिवेशजनित विषयसे निःसंग-निरपेक्ष होकर लौट आता है ॥७९॥ |
मनोवृत्तियोंकी सन्धिमें ब्रह्मसाक्षात्कार
निवृत्तस्याप्रवृत्तस्य निश्चला हि तदा स्थितिः ।
विषयः स हि बुद्धानां तत्साम्यमजमद्वयम् ॥ ८० ॥
इस प्रकार [द्वैतसे] निवृत्त और [विषयान्तरमें] प्रवृत्त न हुए चित्तकी उस समय निश्चल स्थिति रहती है । वह परमार्थदर्शी पुरुषोंका ही विषय है और वही परम साम्य, अज और अद्वय है ॥ ८० ॥
| निवृत्तस्य द्वैतविषयाद्विषयान्तरे चाप्रवृत्तस्याभावदर्शनेन चित्तस्य निश्चला चलनवर्जिता ब्रह्मस्वरूपैव तदा स्थितिः । यैषा ब्रह्मस्वरूपा स्थितिश्चित्तस्याद्वयविज्ञानैकरसघनलक्षणा, स हि यस्माद्विषयो गोचरः परमार्थदर्शिनां बुद्धानां तस्मात्तत्साम्यं परं निर्विशेषमजमद्वयं च ॥८०॥ | उस समय द्वैतविषयसे निवृत्त और विषयान्तरमें अप्रवृत्त चित्तकी अभावदर्शनके कारण निश्चल-चलनवर्जिता अर्थात् ब्रह्मस्वरूपा स्थिति रहती है । चित्तकी जो यह अद्वयविज्ञानैकरसघनरूपा ब्रह्ममयी स्थिति है वह, क्योंकि परमार्थदर्शी ज्ञानियोंका विषय-गोचर है इसलिये, परमसाम्य—निर्विशेष अज और अद्वय है ॥ ८० ॥ |
| पुनरपि कीदृशश्चासौ बुद्धानां विषय इत्याह— | वह ज्ञानियोंका विषय किस प्रकारका है? सो फिर भी बतलाते हैं— |