माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished301 पृष्ठ
पृष्ठ 268, कुल 301 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 268
| २४८ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
|---|
बुद्ध्वानिमित्तां सत्यां हेतुं पृथगनाप्नुवन् ।
वीतशोकं तथाकाममभयं पदमश्नुते ॥ ७८ ॥
अनिमित्तताको ही सत्य जानकर और [ देवादि योनिकी प्राप्तिके ] किसी अन्य हेतुको न पाकर विद्वान् शोक और कामसे रहित अभयपद प्राप्त कर लेता है ॥ ७८ ॥
| अनिमित्तां च सत्यां परमार्थरूपां बुद्ध्वा हेतुं धर्मादिकारणं देवादियोनिप्राप्तये पृथगनाप्नुवन्ननुपादानस्त्यक्तबाह्यैषणः सन्कामशोकादिवर्जितमविद्यादिरहितमभयं पदमश्नुते पुनर्न जायत इत्यर्थः ॥ ७८ ॥ | अनिमित्तताको ही सत्य यानी परमार्थरूप जानकर तथा देवादि योनियोंकी प्राप्तिके लिये किसी अन्य धर्मादि कारणको न पाकर [ विद्वान् ] बाह्य एषणाओंसे मुक्त हो कामना एवं शोकादिसे रहित अविद्याशून्य अभय-पदको प्राप्त कर लेता है; अर्थात् फिर जन्म नहीं लेता ॥७८॥ |
अभूताभिनिवेशाद्धि सदृशे तत्प्रवर्तते ।
वस्त्वभावं स बुद्ध्वैव निःसङ्गं विनिवर्तते ॥ ७९ ॥
चित्त असत्य [ द्वैत ] के अभिनिवेशसे ही तदनुरूप विषयोंमें प्रवृत्त होता है । तथा द्वैत वस्तुके अभावका बोध होनेपर ही वह उससे निःसंग होकर लौट आता है ॥ ७९ ॥
| यस्मादभूताभिनिवेशादसति द्वये द्वयास्तित्वनिश्चयोऽभूताभिनिवेशस्तस्मादविद्याव्यामोहरूपाद्धि सदृशे तदनुरूपे तच्चित्तं | क्योंकि अभूताभिनिवेशसे जो द्वैत वस्तुतः असत् है उसके अस्तित्वका निश्चय करना 'अभूताभिनिवेश' है—उस अविद्याजनित मोहरूप असत्याभिनिवेशके कारण ही चित्त तदनुरूप विषयोंमें प्रवृत्त होता है । |