माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
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शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण २४७
अनिमित्तस्य चित्तस्य यानुत्पत्तिः समाद्वया ।
अजातस्यैव सर्वस्य चित्तदृश्यं हि तद्यतः ॥ ७७ ॥
[ इस प्रकार ] निमित्तशून्य चित्तकी जो अनुत्पत्ति है वह सर्वथा निर्विशेष और अद्वितीय है। [ क्योंकि पहले भी ] वह सर्वदा अजात [ अर्थात् अद्वितीय ] चित्तकी ही होती है, क्योंकि यह जो कुछ [ प्रतीयमान द्वैतवर्ग ] है, सब चित्तका ही दृश्य है ॥ ७७ ॥
| परमार्थदर्शनेन निरस्तधर्माधर्माख्योत्पत्तिनिमित्तस्यानिमित्तस्य चित्तस्येति या मोक्षाख्यानुत्पत्तिः सा सर्वदा सर्वावस्थासु समा निर्विशेषाद्वया च । पूर्वमप्यजातस्यैवानुत्पन्नस्य चित्तस्य सर्वस्याद्वयस्येत्यर्थः । यस्मात्प्रागपि विज्ञानाच्चित्तदृश्यं तद्द्वयं जन्म च तस्मादजातस्य सर्वस्य सर्वदा चित्तस्य समाद्वयैवानुत्पत्तिर्न पुनः कदाचिद्भवति कदाचिद्वा न भवति। सर्वदैकरूपैवेत्यर्थः॥७७॥ | परमार्थज्ञानके द्वारा जिसका धर्माधर्मरूप उत्पत्तिका कारण निवृत्त हो गया है उस निमित्तशून्य चित्तकी जो मोक्षसंज्ञक अनुत्पत्ति है वह सर्वदा सब अवस्थाओंमें समान अर्थात् निर्विशेष और अद्वितीय है। वह पहलेसे ही अजात—अनुत्पन्न और सर्व अर्थात् अद्वय चित्तकी ही होती है। क्योंकि बोध होनेके पूर्व भी वह द्वैत और जन्म चित्तका ही दृश्य था अतः सम्पूर्ण अजात चित्तकी अनुत्पत्ति सर्वदा समान और अद्वय ही होती है। ऐसी नहीं है कि कभी होती है और कभी नहीं होती। तात्पर्य यह है कि वह सर्वदा एकरूपा ही है ॥ ७७ ॥ |
विद्वान्की अभयपदप्राप्ति
| यथोक्तेन न्यायेन जन्मनिमित्तस्य द्वयस्याभावात्— | उपर्युक्त न्यायसे जन्मके हेतुभूत द्वैतका अभाव होनेके कारण— |