माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २४६ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| (हेतुत्रयाभावाज्जन्माभावः) <br> जात्याश्रमविहिता आशीर्व- <br> र्जितैरनुष्ठीयमाना <br> धर्मा देवत्वादि- <br> प्राप्तिहेतव उत्तमाः <br> केवलाश्च धर्माः। अधर्मव्यामिश्रा <br> मनुष्यत्वादिप्राप्त्यर्था मध्यमाः। <br> तिर्यगादिप्राप्तिनिमित्ता अधर्म- <br> लक्षणाः प्रवृत्तिविशेषाश्चाधमाः। <br> तानुत्तममध्यमाधमानविद्यापरि- <br> कल्पितान्यदै कमेवाद्वितीयमात्म- <br> तत्त्वं सर्वकल्पनावर्जितं जानन्न <br> लभते न पश्यति यथा बालैर्दृश्य- <br> मानं गगने मलं विवेकी न पश्यति <br> तद्वत्तदा न जायते नोत्पद्यते <br> चित्तं देवाद्याकारैरुत्तमाधम- <br> मध्यमफलरूपेण। न ह्यसति <br> हेतौ फलमुत्पद्यते बीजाद्यभाव <br> इव सस्यादि ॥७६॥ | निष्काम मनुष्योंद्वारा अनुष्ठान <br> किये जाते हुए देवत्वादिकी प्राप्तिके <br> हेतुभूत वर्णाश्रमविहित धर्म, जो <br> केवल धर्म ही हैं, उत्तम हेतु हैं और <br> मनुष्यत्वादिकी प्राप्तिके हेतुभूत जो <br> अधर्ममिश्रित धर्म हैं वे मध्यम हेतु हैं <br> तथा तिर्यगादि योनियोंकी प्राप्तिकी <br> हेतुभूत अधर्ममयी विशेष प्रवृत्तियाँ <br> अधम हेतु हैं। जिस समय सम्पूर्ण <br> कल्पनासे रहित एकमात्र अद्वितीय <br> आत्मतत्त्वका ज्ञान होनेपर उन उत्तम, <br> मध्यम और अधम हेतुओंको मनुष्य <br> इस प्रकार उपलब्ध नहीं करता, <br> जैसे कि विवेकी पुरुष आकाशमें <br> बालकोंको दिखायी देनेवाली <br> मलिनताको नहीं देखता, उस समय <br> चित्त उत्तम, मध्यम और अधम फल- <br> रूपसे देवादि शरीरोंमें उत्पन्न नहीं <br> होता। बीजादिके अभावमें जैसे <br> अन्नादि उत्पन्न नहीं होते उसी <br> प्रकार हेतुके न होनेपर फलकी भी <br> उत्पत्ति नहीं होती ॥ ७६ ॥ |
| हेत्वभावे चित्तं नोत्पद्यत इति <br> युक्तम्। सा पुनरनुत्पत्तिश्चित्तस्य <br> कीदृशीत्युच्यते- | हेतुका अभाव हो जानेपर चित्त <br> उत्पन्न नहीं होता—ऐसा पहले कहा <br> गया। किन्तु वह चित्तकी अनुत्पत्ति <br> कैसी होती है? इसपर कहा जाता है— |
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