माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished301 पृष्ठ
पृष्ठ 270, कुल 301 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 270
| २५० | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
|---|
अजमनिद्रमस्वप्नं प्रभातं भवति स्वयम् ।
सकृद्विभातो ह्येवैष धर्मो धातुस्वभावतः ॥ ८१ ॥
वह अज, अनिद्र, अस्वप्न और स्वयंप्रकाश है। यह [आत्मा-नामक] धर्म अपने वस्तु-स्वभावसे ही नित्यप्रकाशमान है ॥८१॥
| स्वयमेव तत्प्रभातं भवति, नादित्याद्यपेक्षम्; स्वयंज्योतिःस्वभावमित्यर्थः । सकृद्विभातः सदैव विभात इत्येतदेष एवंलक्षण आत्माख्यो धर्मो धातुस्वभावतो वस्तुस्वभावत इत्यर्थः ॥ ८१ ॥ | वह स्वयं ही प्रकाशित होता है—आदित्य आदिकी अपेक्षासे नहीं अर्थात् वह स्वयं प्रकाशस्वभाव है । यह ऐसे लक्षणोंवाला आत्मा नामक धर्म धातुस्वभाव-वस्तुस्वभावसे ही सकृद्विभात सदा भासमान है ॥८१॥ |
आत्माकी दुर्दर्शताका हेतु
| एवमुच्यमानमपि परमार्थतत्त्वं कस्माल्लौकिकैर्न गृह्यत इत्युच्यते— | इस प्रकार कहे जानेपर भी लौकिक पुरुषोंको इस परमार्थतत्त्वका बोध क्यों नहीं होता ? इसपर कहते हैं— |
सुखमाव्रियते नित्यं दुःखं विव्रियते सदा ।
यस्य कस्य च धर्मस्य ग्रहेण भगवानसौ ॥ ८२ ॥
वे भगवान् जिस-तिस द्वैत वस्तुके आग्रहसे अनायास ही आच्छादित हो जाते हैं और सदा कठिनतासे प्रकट होते हैं ॥८२॥
| यस्माद्यस्य कस्यचिद्द्वैतवस्तुनो धर्मस्य ग्रहेण ग्रहावेशेन मिथ्या- | क्योंकि जिस-तिस धर्म—द्वैत वस्तुके ग्रहण—आग्रहसे मिथ्या- |