भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण २५१


| भिनिविष्टतया सुखमाव्रियतेऽनायासेनाच्छाद्यत इत्यर्थः। द्वयोपलब्धिनिमित्तं हि तत्रावरणं न यत्नान्तरमपेक्षते । दुःखं च विव्रियते प्रकटीक्रियते, परमार्थज्ञानस्य दुर्लभत्वात् । भगवान्सावात्माद्वयो देव इत्यर्थः, अतो वेदान्तैराचार्यैश्च बहुश उच्यमानोऽपि नैव ज्ञातुं शक्य इत्यर्थः। "आश्चर्यो वक्ता कुशलोऽस्य लब्धा" (क० उ० १ । २ । ७) इति श्रुतेः॥ ८२॥ | भिनिवेशके कारण वे भगवान् अर्थात् अद्वय आत्मदेव सहज ही आवृत हो जाते हैं अर्थात् बिना आयासके ही आच्छादित हो जाते हैं—क्योंकि द्वैतोपलब्धिके निमित्तसे होनेवाला आवरण किसी अन्य यत्नकी अपेक्षा नहीं करता—और परमार्थज्ञान दुर्लभ होनेके कारण दुःखसे प्रकट किये जाते हैं; इसलिये वेदान्ताचार्योंके अनेक प्रकार निरूपण करनेपर भी जाननेमें नहीं आ सकते—यह इसका तात्पर्य है । "इसका वर्णन करनेवाला आश्चर्यरूप है तथा इसे ग्रहण करनेवाला भी कोई निपुण पुरुष ही होता है" इस श्रुतिसे भी यही सिद्ध होता है ॥ ८२ ॥ |


परमार्थका आवरण करनेवाले असदभिनिवेश

| अस्ति नास्तीत्यादिसूक्ष्मविषया अपि पण्डितानां ग्रहा भगवतः परमात्मन आवरणा एव किमुत मूढजनानां बुद्धिलक्षणा इत्येवमर्थं प्रदर्शयन्नाह— | अस्ति-नास्ति इत्यादि सूक्ष्मविषय भी, जो पण्डितोंके आग्रह हैं, भगवान् परमात्माके आवरण ही हैं, फिर मूर्ख लोगोंके बुद्धिरूप आग्रहोंकी तो बात ही क्या है ? इसी बातको दिखलाते हुए कहते हैं— |

अस्ति नास्त्यस्ति नास्तीति नास्ति नास्तीति वा पुनः।
चलस्थिरोभयाभावैरावृणोत्येव बालिशः ॥८३॥