माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
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| २५२ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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आत्मा है, नहीं है, है भी और नहीं भी है तथा नहीं है—नहीं है— इस प्रकार क्रमशः चल, स्थिर, उभयरूप और अभावरूप कोटियोंसे मूर्खलोग परमात्माको आच्छादित ही करते हैं ॥ ८३ ॥
| अस्त्यात्मेति वादी कश्चित्प्रतिपद्यते । नास्तीत्यपरो वैनाशिकः । अस्ति नास्तीत्यपरोऽर्धवैनाशिकः सदसद्वादी दिग्वासाः । नास्ति नास्तीत्यत्यन्तशून्यवादी । तत्रास्तिभावश्चलः, घटाद्यनित्यविलक्षणत्वात् । नास्तिभावः स्थिरः सदाविशेषत्वात् । उभयं चलस्थिरविषयत्वात्सदसद्भावोऽभावोऽत्यन्ताभावः ।<br><br>प्रकारचतुष्टयस्यापि तैरेतैश्चलस्थिरोभयाभावैः सदसदादिवादी सर्वोऽपि भगवन्तमावृणोत्येव बालिशोऽविवेकी । यद्यपि पण्डितो बालिश एव परमार्थतत्त्वानवबोधात्किमु स्वभावमूढो जन इत्यभिप्रायः ॥ ८३ ॥ | कोई वादी कहता है—'आत्मा है'। दूसरा वैनाशिक कहता है—'नहीं है'। तीसरा अर्द्धवैनाशिक सदसद्वादी दिगम्बर कहता है—'है भी और नहीं भी है'। तथा अत्यन्त शून्यवादीका कथन है कि 'नहीं है—नहीं है'। इनमें अस्तिभाव 'चल' है, क्योंकि वह घट आदि अनित्य पदार्थोंसे भिन्न है। [तात्पर्य यह है कि घटादिका प्रमाता सुखादि विशेष धर्मोंसे युक्त होनेके कारण परिणामी—चल है]। सदा अविशेषरूप होनेसे नास्तिभाव 'स्थिर' है। चल और स्थिरविषयक होनेसे सदसद्भाव उभयरूप है तथा अभाव अत्यन्ताभावरूप है।<br><br>इन चल, स्थिर, चलस्थिर और अभावरूप चार प्रकारके भावोंसे सभी मूर्ख अर्थात् विवेकहीन सदसदादिवादीगण भगवान्को आच्छादित ही करते हैं। वे यद्यपि पण्डित हैं, तो भी परमार्थतत्त्वका ज्ञान न होनेके कारण मूर्ख ही हैं। अतः तात्पर्य यह है कि फिर स्वभावसे ही मूर्ख लोगोंकी तो बात ही क्या है? ॥ ८३ ॥ |