भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished301 पृष्ठ

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पृष्ठ 273

शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण २५३


कीदृक्पुनः परमार्थतत्त्वं यद्ब-बोधादवालिशः पण्डितो भवतीत्याह—तो फिर वह परमार्थतत्त्व कैसा है जिसका ज्ञान होनेपर मनुष्य अवालिश अर्थात् पण्डित हो जाता है ? इसपर कहते हैं—

कोट्यश्चतस्र एतास्तु ग्रहैर्यासां सदावृतः ।

भगवानाभिरस्पृष्टो येन दृष्टः स सर्वदृक् ॥ ८४ ॥

जिनके अभिनिवेशसे आत्मा सदा ही आवृत रहता है वे ये चार ही कोटियाँ हैं। इनसे असंस्पृष्ट (अछूते) भगवान्‌को जिसने देखा है वही सर्वज्ञ हैं ॥ ८४ ॥

[ चतुष्कोटिवर्जितात्मज्ञानस्य सार्वज्ञ्यकारणत्वम् ]

कोटयः प्रावादुकशास्त्रनिर्णयान्ता एता उक्ता अस्ति नास्तीत्याद्याश्चतस्रो यासां कोटीनां ग्रहैर्ग्रहणैरुपलब्धिनिश्चयैः सदा सर्वदावृत आच्छादितस्तेषामेव प्रावादुकानां यः स भगवानाभिरस्तिनास्तीत्यादिकोटिभिश्चतसृभिरप्यस्पृष्टोऽस्त्यादिविकल्पनावर्जित इत्येतद्येन मुनिना दृष्टो ज्ञातो वेदान्तेष्वौपनिषदः पुरुषः स सर्वदृक्सर्वज्ञः परमार्थपण्डित इत्यर्थः ॥ ८४ ॥उन प्रवाद करनेवाले वादियोंके शास्त्रोंद्वारा निर्णय की हुई ये अस्ति-नास्ति आदि चार ही कोटियाँ हैं। जिन कोटियोंके ग्रह-ग्रहणसे ही, अर्थात् उन प्रावादुकोंके इस उपलब्धि-जनित निश्चयसे ही जो भगवान् सदा आवृत है उसे जिस मुनिने इन अस्ति-नास्ति आदि चारों ही कोटियोंसे असंस्पृष्ट अर्थात् अस्ति-नास्ति आदि विकल्पसे सर्वदा रहित देखा है, यानी उसे वेदान्तोंमें [प्रतिपादित] औपनिषद पुरुषरूपसे जाना है वही सर्वदृक्—सर्वज्ञ अर्थात् परमार्थको जाननेवाला है ॥ ८४ ॥

ज्ञानीका नैष्कर्म्य

प्राप्य सर्वज्ञतां कृत्स्नां ब्राह्मण्यं पदमद्वयम् ।

अनापन्नादिमध्यान्तं किमतः परमीहते ॥ ८५ ॥

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