भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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पृष्ठ 274
२५४माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०

इस पूर्ण सर्वज्ञता और आदि, मध्य एवं अन्तसे रहित अद्वितीय ब्राह्मण्य पदको पाकर भी क्या [ वह विवेकी पुरुष ] फिर कोई चेष्टा करता है ? ॥८५॥

प्राप्यैतां यथोक्तां कृत्स्नां समस्तां सर्वज्ञतां ब्राह्मण्यं पदं “स ब्राह्मणः” (बृ० उ० ३।८।१०) “एष नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य” (बृ० उ० ४।४।२३) इति श्रुतेः; आदिमध्यान्ता उत्पत्तिस्थिति-लया अनापन्ना अप्राप्ता यस्याद्व-यस्य पदस्य न विद्यन्ते तदना-पन्नादिमध्यान्तं ब्राह्मण्यं पदम्, तदेष प्राप्य लब्ध्वा किमतः परमस्मादात्मलाभादूर्ध्वमीहते चे-ष्टते निष्प्रयोजनमित्यर्थः । “नैव तस्य कृतेनार्थः” (गीता ३।१८) इत्यादिस्मृतेः ॥ ८५ ॥इस उपर्युक्त सम्पूर्ण सर्वज्ञता और “[ जो इस अक्षरको जानकर इस लोकसे जाता है ] वह ब्राह्मण है” “यह ब्राह्मणकी शाश्वती महिमा है” इत्यादि श्रुतियोंके अनुसार ब्राह्मण्यपदको प्राप्तकर—जिस अद्वय पदके आदि, मध्य और अन्त अर्थात् उत्पत्ति स्थिति और लय अनापन्न-अप्राप्त हैं अर्थात् नहीं हैं वह अनापन्नादिमध्यान्त ब्राह्मण्यपद है, उसीको पाकर इससे पीछे-इस आत्मलाभके अनन्तर कोई प्रयोजन न रहनेपर भी क्या [ वह विद्वान् ] कोई चेष्टा करता है ? [ अर्थात् नहीं करता ] जैसा कि “उसका किसी कार्यसे प्रयोजन नहीं रहता” इस स्मृतिसे प्रमाणित होता है ॥८५॥

विप्राणां विनयो ह्येष शमः प्राकृत उच्यते ।
दमः प्रकृतिदान्तत्वादेवं विद्वाञ्शमं व्रजेत् ॥ ८६ ॥

[ आत्मस्वरूपमें स्थित रहना ] यह उन ब्राह्मणोंका विनय है, यही उनका स्वाभाविक शम कहा जाता है तथा स्वभावसे ही दान्त ( जितेन्द्रिय ) होनेके कारण यही उनका दम भी है । इस प्रकार विद्वान् शान्तिको प्राप्त हो जाता है ॥ ८६ ॥