माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
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शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण २५५
| विप्राणां ब्राह्मणानां विनयो विनीतत्वं स्वाभाविकं यदेतदात्मस्वरूपेणावस्थानम् । एष विनयः शमोऽप्येष एव प्राकृतः स्वाभाविकॊऽकृतक उच्यते। दमोऽप्येष एव प्रकृतिदान्तत्वात्स्वभावत एव चोपशान्तरूपत्वाद्ब्रह्मणः । एवं यथोक्तं स्वभावोपशान्तं ब्रह्म विद्वाञ्छममुपशान्तिं स्वाभाविकीं ब्रह्मस्वरूपां व्रजेद्ब्रह्मस्वरूपेणावतिष्ठत इत्यर्थः ॥ ८६ ॥ | ब्राह्मणोंका जो यह आत्मस्वरूपसे स्थित होनारूप विनय-विनीतत्व है वह स्वाभाविक है । उनका यह विनय और यही प्राकृत-स्वाभाविक अर्थात् अकृतक शम भी कहा जाता है । ब्रह्मस्वभावसे ही उपशान्तरूप है, अतः प्रकृतितः दान्त होनेके कारण यही उनका दम भी है। इस प्रकार उपर्युक्त स्वभावतः शान्त ब्रह्मको जाननेवाला पुरुष शम-ब्रह्मस्वरूपा स्वाभाविकी उपशान्तिको प्राप्त हो जाता है, अर्थात् ब्रह्मरूपसे स्थित हो जाता है ॥८६॥ |
त्रिविध ज्ञेय
| एवमन्योन्यविरुद्धत्वात्संसारकारणानि रागद्वेषदोषास्पदानि प्रावादुकानां दर्शनानि । अतो मिथ्यादर्शनानि तानीति तद्युक्तिभिरेव दर्शयित्वा चतुष्कोटिवर्जितत्वाद्रागादिदोषानास्पदं स्वभावशान्तमद्वैतदर्शनमेव सम्यग्दर्शनमित्युपसंहृतम् । अथेfieldदानीं स्वप्रक्रियाप्रदर्शनार्थ आरम्भः— | इस प्रकार एक-दूसरेसे विरुद्ध होनेके कारण प्रावादुकों (वादियों) के दर्शन संसारके कारणस्वरूप राग-द्वेषादि दोषोंके आश्रय हैं। अतः वे मिथ्या दर्शन हैं—यह बात उन्हींकी युक्तियोंसे दिखलाकर चारों कोटियोंसे रहित होनेके कारण रागादि दोषोंका अनाश्रयभूत स्वभावतः शान्त अद्वैतदर्शन ही सम्यग्दर्शन है—इस प्रकार उपसंहार किया गया। अब यहाँसे अपनी प्रक्रिया दिखलानेके लिये आरम्भ किया जाता है— |