भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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पृष्ठ 286
२६६माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०
अजेष्वनुत्पन्नेष्वचलेषु धर्मे- <br> ष्वात्मस्वजमचलं च ज्ञानमिष्यते <br> सवितरीवौष्ण्यं प्रकाशश्च यतस्त- <br> स्मादसंक्रान्तमर्थान्तरे ज्ञानमज- <br> मिष्यते । यस्मान्न क्रमतेऽर्थान्तरे <br> ज्ञानं तेन कारणेनासङ्गं तत्कीर्ति- <br> तमाकाशकल्पमित्युक्तम् ॥९६॥क्योंकि अज-अनुत्पन्न यानी अचल धर्मों-आत्माओंमें सूर्यमें उष्णता और प्रकाशके समान अज अर्थात् अचल ज्ञान माना जाता है अतः अर्थान्तरमें असंक्रान्त (अननुप्रविष्ट) ज्ञानको अजन्मा (नित्य) स्वीकार किया जाता है । क्योंकि वह ज्ञान दूसरे विषयोंमें संक्रमित नहीं होता इसलिये उसे असंग कहा गया है; अर्थात् वह आकाशके समान है-ऐसा कहा है ॥९६॥

जातवादमें दोषप्रदर्शन

अणुमात्रेऽपि वैधर्म्ये जायमानेऽविपश्चितः ।
असङ्गता सदा नास्ति किमुतावरणच्युतिः ॥ ९७ ॥

[ अन्य वादियोंके मतानुसार ] किसी अणुमात्र भी विधर्मी वस्तुकी उत्पत्ति माननेपर तो अविवेकी पुरुषकी असंगता भी कभी नहीं हो सकती; फिर उसके आवरणनाशके विषयमें तो कहना ही क्या है ? ॥९७॥

इतोऽन्येषां वादिनामणुमात्रे- <br> ऽपि वैधर्म्ये वस्तुनि बहिरन्तर्वा <br> जायमान उत्पाद्यमानेऽविपश्चि- <br> तोऽविवेकिनोऽसङ्गता असङ्गत्वं <br> सदा नास्ति किमुत वक्तव्यमावर- <br> णच्युतिर्बन्धननाशो नास्तीति।९७।इससे भिन्न जो अन्य वादी हैं उनके मतानुसार अणुमात्र अर्थात् थोड़ी-सी भी विधर्मी वस्तुके बाहर या भीतर उत्पन्न होनेपर तो अविपश्चित्-अविवेकी पुरुषकी कभी असङ्गता भी नहीं हो सकती फिर उसकी आवरणच्युति अर्थात् बन्धनाश नहीं होता-इसके सम्बन्धमें तो कहना ही क्या है ? ॥९७॥