भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण २६७


आत्माका स्वाभाविक स्वरूप

तेषामावरणच्युतिर्नास्तीति ब्रुवतां स्वसिद्धान्तेऽभ्युपगतं तर्हि धर्माणामावरणम् । नेत्युच्यते ।उनकी आवरणच्युति नहीं होती—ऐसा कहकर तो तुमने अपने सिद्धान्तमें भी आत्माओंका आवरण स्वीकार कर लिया [–ऐसा यदि कोई कहे तो] इसपर हमारा कहना है—नहीं,

अलब्धावरणाः सर्वे धर्माः प्रकृतिनिर्मलाः ।
आदौ बुद्धास्तथा मुक्ता बुध्यन्त इति नायकाः ॥ ९८ ॥

समस्त आत्मा आवरणशून्य, स्वभावसे ही निर्मल तथा नित्य बुद्ध और मुक्त हैं । तथापि स्वामीलोग (वेदान्ताचार्यगण) 'वे जाने जाते हैं' ऐसा [उनके विषयमें कहते हैं] ॥९८॥

अलब्धावरणाः—अलब्धम्-प्राप्तमावरणमविद्यादिबन्धनं येषां ते धर्मा अलब्धावरणा बन्धनरहिता इत्यर्थः, प्रकृतिनिर्मलाः स्वभावशुद्धा आदौ बुद्धास्तथा मुक्ता यस्मान्नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावाः । <br><br> यद्येवं कथं तर्हि बुध्यन्त इत्युच्यते ? <br><br> नायकाः स्वामिनः समर्था बोद्धुं बोधशक्तिमत्स्वभावा'अलब्धावरणाः'—जिन्हें आवरण अर्थात् अविद्यादिरूप बन्धन लाभ अर्थात् प्राप्त नहीं हुआ है वे धर्म अलब्धावरण अर्थात् बन्धनरहित, प्रकृति-निर्मल-स्वभावसे ही शुद्ध और आरम्भमें ही बोधको प्राप्त हुए तथा मुक्तस्वरूप हैं, क्योंकि वे नित्य शुद्धबुद्धमुक्तस्वभाव हैं । <br><br> शंका—यदि ऐसी बात है तो उनके विषयमें 'वे जाने जाते हैं' ऐसा क्यों कहा जाता है ? <br><br> समाधान—नायक—स्वामी लोग—जाननेमें समर्थ अर्थात् बोधशक्ति-