माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६८ [ गौ० का०
इत्यादि... लोग उनके विषयमें उस प्रकार ऐसा कहते हैं जैसे कि नित्य प्रकाशस्वरूप होनेपर भी सूर्यके विषयमें 'सूर्य प्रकाशमान है' ऐसा कहा जाता है तथा सर्वदा गतिशून्य होनेपर भी 'पर्वत खड़े हैं' ऐसा कहा जाता है ॥ ९८ ॥
इत्यर्थः, यथा स्वरूपोऽपि सन् प्रकाशत इत्युच्यते यथा वा नित्यनिवृत्तगतयोऽपि नित्यमेव शैलास्तिष्ठन्तीत्युच्यते तद्वत् ॥ ९८ ॥
अजातवाद बौद्धदर्शन नहीं है
क्रमते न हि बुद्धस्य ज्ञानं धर्मेषु तायिनः ।
सर्वे धर्मास्तथा ज्ञानं नैतद्बुद्धेन भाषितम् ॥ ९९ ॥
अखण्ड प्रज्ञानवान् परमार्थदर्शीका ज्ञान धर्मों (विषयों) में संक्रमित नहीं होता और न [उसके मतमें] सम्पूर्ण धर्म (आत्मा) ही कहीं जाते हैं । परन्तु ऐसा ज्ञान बुद्धदेवने नहीं कहा [अर्थात् यह बौद्ध सिद्धान्त नहीं है, बल्कि औपनिषद दर्शन है] ॥ ९९ ॥
| यस्मान्न हि क्रमते बुद्धस्य परमार्थदर्शिनो ज्ञानं विषयान्तरेषु धर्मेषु धर्मसंस्थं सवितरीव प्रभा, तायिनः तायोऽस्यास्तीति तायी, संतानवतो निरन्तरस्याकाशकल्पस्येत्यर्थः, पूजावतो वा प्रज्ञावतो वा, सर्वे धर्मा आत्मानोऽपि तथा ज्ञानंवदेवाकाशकल्पत्वान्न क्रमन्ते क्वचिदप्यर्थान्तर इत्यर्थः । | तायी-जिसका ताय यानी (विस्तार) हो उसे तायी कहते हैं। क्योंकि तायी-सन्तानवान्-निरन्तर अर्थात् आकाशसदृश पूजावान् अथवा प्रज्ञावान् बुद्ध-परमार्थदर्शीका ज्ञान धर्मोंमें-विषयान्तरोंमें संक्रमित नहीं होता अपितु सूर्यमें प्रकाशकी भाँति आत्मनिष्ठ रहता है, उसी प्रकार सम्पूर्ण धर्म अर्थात् आत्मा भी ज्ञानके समान ही आकाशसदृश होनेके कारण कभी अर्थान्तरमें संक्रमित नहीं होते अर्थात् नहीं जाते। |