भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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शां० भा० ]अलातशान्तिप्रकरण२६९
यदादावुपन्यस्तं ज्ञानेनाका-<br>शकल्पेनेत्यादि तदिदमाकाश-<br>कल्पस्य तायिनो बुद्धस्य तदनन्य-<br>त्वादाकाशकल्पं ज्ञानं न क्रमते<br>क्वचिदप्यर्थान्तरे । तथा धर्मा<br>इति । आकाशमिवाचलमविक्रियं<br>निरवयवं नित्यमद्वितीयमसङ्ग-<br>मदृश्यमग्राह्यमशनायाद्यतीतं ब्र-<br>ह्मात्मतत्त्वम् । “न हि द्रष्टुर्दृष्टे-<br>र्विपरिलोपो विद्यते” (बृ० उ०<br>४ । ३ । २३) इति श्रुतेः ।<br>ज्ञानज्ञेयज्ञातृभेदरहितं पर-<br>मार्थतत्त्वमद्वयम् एतन्न बुद्धेन<br>भाषितम् । यद्यपि बाह्यार्थनिरा-<br>करणं ज्ञानमात्रकल्पना चाद्वय-<br>वस्तुसामीप्यमुक्तम् । इदं तु<br>परमार्थतत्त्वमद्वैतं वेदान्तेष्वेव<br>विज्ञेयमित्यर्थः ॥ ९९ ॥˙इस प्रकरणके आरम्भमें जिसका<br>‘ज्ञानेनाकाशकल्पेन’ इत्यादि<br>श्लोकद्वारा उपन्यास किया गया है,<br>आकाशसदृश निरन्तर बोधवान्‌का—<br>उससे अभिन्न होनेके कारण—वही<br>यह आकाशसदृश ज्ञान कभी<br>अर्थान्तरमें संक्रमित नहीं होता;<br>और ऐसे ही धर्म भी हैं अर्थात् वे<br>भी आकाशके समान अचल,<br>अविक्रिय, निरवयव, नित्य,<br>अद्वितीय, असंग, अदृश्य, अग्राह्य<br>और क्षुधा-पिपासादिसे रहित ब्रह्मा-<br>त्मतत्त्व ही हैं; जैसा कि “द्रष्टाकी<br>दृष्टिका लोप नहीं होता” इस श्रुति-<br>से सिद्ध होता है ।<br>ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाताके भेदसे<br>रहित इस अद्वय परमार्थतत्त्वका<br>बुद्धने निरूपण नहीं किया; यद्यपि<br>उसने बाह्यवस्तुका निराकरण और<br>केवल ज्ञानकी ही कल्पना—ये अद्वय<br>वस्तुके समीपवर्ती ही विषय कहे हैं;<br>तात्पर्य यह है कि इस अद्वैत<br>परमार्थतत्त्वको तो वेदान्तका ही<br>विषय जानना चाहिये ॥ ९९ ॥