माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
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२७० माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०
परमार्थपद-वन्दना
| शास्त्रसमाप्तौ परमार्थतत्त्व-स्तुत्यर्थं नमस्कार उच्यते— | अब शास्त्रकी समाप्ति होनेपर परमार्थतत्त्वकी स्तुतिके लिये नमस्कार कहा जाता है— |
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दुर्दर्शमतिगम्भीरमजं साम्यं विशारदम् ।
बुद्ध्वा पदमनानात्वं नमस्कुर्मो यथाबलम् ॥१००॥
दुर्दर्श, अत्यन्त गम्भीर, अज, निर्विशेष और विशुद्ध पदको भेदरहित जानकर हम उसे यथाशक्ति नमस्कार करते हैं ॥१००॥
| दुर्दर्शं दुःखेन दर्शनमस्येति दुर्दर्शम्, अस्ति नास्तीति चतुष्कोटिवर्जितत्वादुर्विज्ञेयमित्यर्थः । अत एवातिगम्भीरं दुष्प्रवेशं महासमुद्रवदकृतप्रज्ञैः, अजं साम्यं विशारदम्, ईदृशंपदमनानात्वं नानात्ववर्जितं बुद्ध्वावगम्य तद्भूताः सन्तो नमस्कुर्मस्तस्मै पदाय, अव्यवहार्यमपि व्यवहारगोचरतापाद्य यथाबलं यथाशक्तीत्यर्थः ॥ १०० ॥ | जिसका कठिनतासे दर्शन हो सकता है ऐसे दुर्दर्श अर्थात् अस्ति-नास्ति आदि चारों कोटियोंसे रहित होनेके कारण दुर्विज्ञेय, अतएव अति गम्भीर—मन्दबुद्धियोंके लिये महासमुद्रके समान दुष्प्रवेश्य तथा अजन्मा, साम्यरूप (निर्विशेष) और विशुद्ध—ऐसे पदको भेदरहित जानकर तद्रूप हो और उस अव्यवहार्य-पदको भी व्यवहारका विषय बनाकर हम उसको यथाबल–यथाशक्ति नमस्कार करते हैं ॥१००॥ |
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भाष्यकारकर्तृक वन्दना
अजमपि जनियोगं प्रापदैश्वर्ययोगा-
द्गति च गतिमत्तां प्रापदेकं ह्यनेकम् ।