माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण २७१
विविधविषयधर्मग्राहिसुग्धेक्षणानां
प्रणतभयविहन्तृ ब्रह्म यत्तन्नतोऽस्मि ॥ १ ॥
जिसने अजन्मा होकर भी अपनी ईश्वरीयशक्तिके योगसे जन्म ग्रहण किया, गतिशून्य होनेपर भी गति स्वीकारकी तथा जो नाना प्रकारके विषयरूप धर्मोंको ग्रहण करनेवाले मूढदृष्टि लोगोंके विचारसे एक होकर भी अनेक हुआ है और जो शरणागतभयहारी है उस ब्रह्मको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ १ ॥
प्रज्ञावैशारद्यवेधक्षुभितजलनिधेर्वेदनाम्नोऽन्तरस्थं
भूतान्यालोक्य मग्नान्यविरतजननग्राहघोरे समुद्रे।
कारुण्यादुद्दधारामृतमिदममरैर्दुर्लभं भूतहेतो-
र्यस्तं पूज्याभिपूज्यं परमगुरुममुं पादपातैर्नतोऽस्मि ॥२॥
जो निरन्तर जन्म-जन्मान्तररूप ग्राहोंके कारण अत्यन्त भयानक है ऐसे संसारसागरमें जीवोंको डूबे हुए देखकर जिन्होंने करुणावश अपनी विशुद्ध बुद्धिरूप मन्थनदण्डके आघातसे क्षुभित हुए वेद नामक महासमुद्रके भीतर स्थित इस देवदुर्लभ अमृतको प्राणियोंके कल्याणके लिये निकाला है, उन पूजनीयोंके भी पूजनीय परम गुरु (श्रीगौडपादाचार्य) को मैं उनके चरणोंमें गिरकर प्रणाम करता हूँ ॥२॥
यत्प्रज्ञालोकभासा प्रतिहतिमगमत्स्वान्तमोहान्धकारो
मज्जन्मज्जच्च घोरे ह्यसकृदुपजनोदन्वति त्रासने मे।
यत्पादावाश्रितानां श्रुतिशमविनयप्राप्तिरग्र्या ह्यमोघा
तत्पादौ पावनीयौ भवभयविनुदौ सर्वभावैर्नमस्ये ॥३॥
जिनके ज्ञानालोककी प्रभासे मेरे अन्तःकरणका मोहरूप अन्धकार नाशको प्राप्त हुआ तथा इस भयङ्कर संसारसागरमें वारम्वार