भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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पृष्ठ 38

१८ माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०


प्राज्ञका सर्वकारणत्व

एष सर्वेश्वर एष सर्वज्ञः एषोऽन्तर्याम्येष योनिः सर्वस्य प्रभवाप्ययौ हि भूतानाम् ॥६॥

यह सबका ईश्वर है, यह सर्वज्ञ है, यह अन्तर्यामी है और समस्त जीवोंकी उत्पत्ति तथा लयका स्थान होनेके कारण यह सबका कारण भी है ॥ ६ ॥

एष हि स्वरूपावस्थः सर्वेश्वरः साधिदैविकस्य भेदजातस्य सर्वस्येशिता नैतस्माज्जात्यन्तरभूतोऽन्येषामिव । “प्राणबन्धनं हि सोम्य मनः” (छा० उ० ६।८।२) इति श्रुतेः। अयमेव हि सर्वस्य सर्वभेदावस्थो ज्ञातेत्येष सर्वज्ञः । एषोऽन्तर्याम्यन्तरनुप्रविश्य सर्वेषां भूतानां नियन्ताप्येष एव । अत एव यथोक्तं सभेदं जगत्प्रसूयत इत्येष योनिः सर्वस्य । यत एवं प्रभवश्चाप्ययश्च प्रभवाप्ययौ हि भूतानामेष एव ॥ ६ ॥अपने स्वरूपमें स्थित यह (प्राज्ञ) ही सर्वेश्वर है, अर्थात् अधिदैवके सहित सम्पूर्ण भेदसमूहका ईश्वर—ईशान (शासन) करनेवाला है। “हे सोम्य ! यह मन (जीव) प्राण (प्राणसंज्ञक ब्रह्म) रूप बन्धनवाला है” इस श्रुतिसे अन्य मतावलम्बियोंके सिद्धान्तानुसार [सर्वज्ञ परमेश्वर] इस प्राज्ञसे कोई विजातीय पदार्थ नहीं है। सम्पूर्ण भेदमें स्थित हुआ यही सबका ज्ञाता है; इसलिये यह सर्वज्ञ है। [अतएव] यह अन्तर्यामी है अर्थात् समस्त प्राणियोंके भीतर अनुप्रविष्ट होकर उनका नियमन करनेवाला भी यही है। इसीसे पूर्वोक्त भेदके सहित सारा जगत् उत्पन्न होता है; इसलिये यही सबका कारण है। क्योंकि ऐसा है, इसलिये यही समस्त प्राणियोंका उत्पत्ति और लयस्थान भी है ॥६॥