भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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शां० भा० ] आगम-प्रकरण १९

एक ही आत्माके तीन भेद अत्रैते श्लोका भवन्ति— इसी अर्थमें ये श्लोक हैं—

अत्रैतस्मिन्यथोक्तेऽर्थ एते श्लोका भवन्ति ।यहाँ इस पूर्वोक्त अर्थमें ये श्लोक हैं—

बहिष्प्रज्ञो विभुर्विश्वो ह्यन्तःप्रज्ञस्तु तैजसः ।
घनप्रज्ञस्तथा प्राज्ञ एक एव त्रिधा स्मृतः ॥ १ ॥

विभु विश्व बहिष्प्रज्ञ है, तैजस अन्तःप्रज्ञ है तथा प्राज्ञ घनप्रज्ञ (प्रज्ञानघन) है। इस प्रकार एक ही आत्मा तीन प्रकारसे कहा जाता है ॥१॥

बहिष्प्रज्ञ इति । पर्यायेण त्रिस्थानत्वात्सोऽहमिति स्मृत्या प्रतिसन्धानाच्च स्थानत्रयव्यतिरिक्तत्वमेकत्वं शुद्धत्वमसङ्गत्वं च सिद्धमित्यभिप्रायः। महामत्स्यादिदृष्टान्तश्रुतेः ॥ १ ॥बहिष्प्रज्ञ इत्यादि । इस श्लोकका तात्पर्य यह है कि क्रमशः तीन स्थानोंवाला होनेसे और 'मैं वही हूँ' इस प्रकारकी स्मृतिद्वारा अनुसन्धान किया जानेके कारण आत्माका तीनों स्थानोंसे पृथक्त्व, एकत्व, शुद्धत्व और असंगत्व सिद्ध होता है, जैसा कि महामत्स्यादि दृष्टान्तका वर्णन करनेवाली श्रुति * बतलाती है ॥१॥

* जिस प्रकार किसी नदीमें रहनेवाला कोई बलवान् मत्स्य उसके प्रवाहसे विचलित न होकर उसके दोनों तटोंपर आता-जाता रहता है; किन्तु उन तटोंसे पृथक् होनेके कारण उनके गुण-दोषोंसे युक्त नहीं होता तथा जिस प्रकार कोई बड़ा पक्षी आकाशमें स्वच्छन्दगतिसे उड़ता रहता है उसी प्रकार स्वप्न और जाग्रत् दोनों स्थानोंमें सञ्चार करनेवाला आत्मा एक, असंग और शुद्ध है—ऐसा मानना उचित ही है। (देखिये बृ० उ० ४।३।१८, १९)