माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished301 पृष्ठ
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| २० | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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विश्वादिके विभिन्न स्थान
| जागरितावस्थायामेव विश्वादीनां त्रयाणामनुभवप्रदर्शनार्थोऽयं श्लोकः- | जाग्रत् अवस्थामें ही विश्व आदि तीनोंका अनुभव दिखलानेके लिये यह श्लोक कहा जाता है— |
दक्षिणाक्षिमुखे विश्वो मनस्यन्तस्तु तैजसः ।
आकाशे च हृदि प्राज्ञस्त्रिधा देहे व्यवस्थितः ॥ २ ॥
दक्षिणनेत्ररूप द्वारमें विश्व रहता है, तैजस मनके भीतर रहता है, प्राज्ञ हृदयाकाशमें उपलब्ध होता है । इस प्रकार यह [ एक ही आत्मा ] शरीरमें तीन प्रकारसे स्थित है ॥ २ ॥
| दक्षिणमक्ष्य्येव मुखं तस्मिन् प्राधान्येन द्रष्टा स्थूलानां विश्वोऽनुभूयते । “इन्धो ह वै नामैष योऽयं दक्षिणेऽक्षन्पुरुषः” ( बृ० उ० ४।२।२ ) इति श्रुतेः। इन्धो दीप्तिगुणो वैश्वानरः । आदित्यान्तर्गतो वैराज आत्मा चक्षुषि च द्रष्टैकः । | दक्षिण नेत्र ही मुख (उपलब्धिका स्थान) है; उसीमें प्रधानतासे स्थूल पदार्थोंके साक्षी विश्वका अनुभव होता है । “यह जो दक्षिण नेत्रमें स्थित पुरुष है 'इन्ध'<sup>१</sup> नामसे प्रसिद्ध है” इस श्रुतिसे भी यही प्रमाणित होता है। दीप्तिगुणविशिष्ट वैश्वानरको 'इन्ध' कहते हैं । आदित्यान्तर्गत वैराजसंज्ञक आत्मा और नेत्रोंमें स्थित साक्षी—ये दोनों एक ही हैं । |
| नन्वन्यो हिरण्यगर्भः क्षेत्रज्ञो दक्षिणेऽक्षण्यक्षणोर्नियन्ता द्रष्टा चान्यो देहस्वामी । | शंका—हिरण्यगर्भ अन्य है तथा दक्षिण नेत्रमें स्थित नेत्रेन्द्रियका नियन्ता और साक्षी देहका स्वामी क्षेत्रज्ञ अन्य है । [ उन दोनोंकी एकता कैसे हो सकती है ? ] |
१. जो जागरित अवस्थामें स्थूल पदार्थोंका भोक्ता होनेके कारण इद्ध-दीप्त होता है ।