माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished301 पृष्ठ
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| मां० का० ] | आगम-प्रकरण | २१ |
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| न, स्वतः भेदानभ्युपगमात् । <br> "एको देवः सर्वभूतेषु गूढः" <br> ( श्वे० उ० ६ । ११) इति <br> श्रुतेः । "क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि <br> सर्वक्षेत्रेषु भारत" (गीता १३। <br> २) "अविभक्तं च भूतेषु विभक्त- <br> मिव च स्थितम्" (गीता १३। <br> १६) इति स्मृतेः। सर्वेषु करणे- <br> ष्वविशेषेऽपि दक्षिणाक्ष्युप- <br> लब्धिपाटवदर्शनात्तत्र विशेषेण <br> निर्देशो विश्वस्य । | **समाधान—**नहीं [ ऐसी बात नहीं है], क्योंकि उनका स्वाभाविक भेद नहीं माना गया, क्योंकि "सम्पूर्ण भूतोंमें एक ही देव छिपा हुआ है" इस श्रुतिसे तथा "हे भारत ! समस्त क्षेत्रोंमें क्षेत्रज्ञ मुझे ही जान" "[ वह वस्तुतः ] विभक्त न होकर भी विभक्तके समान स्थित है" इत्यादि स्मृतियोंसे भी [ यही बात सिद्ध होती है ]। सम्पूर्ण इन्द्रियोंमें समान-रूपसे स्थित होनेपर भी दक्षिण नेत्रमें उसकी उपलब्धिकी स्पष्टता देखनेसे वहीं विश्वका विशेषरूपसे निर्देश किया जाता है । |
| दक्षिणाक्षिगतो रूपं दृष्ट्वा नि- <br> मीलिताक्षस्तदेव स्मरन्मनस्यन्तः <br> स्वप्न इव तदेव वासनारूपाभि- <br> व्यक्तं पश्यति । यथात्र तथा <br> स्वप्ने । अतो मनस्यन्तस्तु तैजसो- <br> ऽपि विश्व एव । | दक्षिणनेत्रस्थित जीवात्मा रूप-को देखकर फिर नेत्र मूँद मनमें उसीका स्मरण करता हुआ वासना-रूपसे अभिव्यक्त उसी रूपका स्वप्नमें उपलब्धकी तरह दर्शन करता है । जिस प्रकार इस अवस्थामें होता है, ठीक वैसा ही स्वप्नमें होता है । [इसलिये यह जाग्रत्में स्वप्न ही है] अतः मनके भीतर स्थित तैजस भी विश्व ही है । |
| आकाशे च हृदि स्मरणाख्य- <br> व्यापारोपरमे प्राज्ञ एकीभूतो | तथा स्मरणरूप व्यापारके निवृत्त हो जानेपर हृदयाकाशमें स्थित प्राज्ञ मनोव्यापारका अभाव, हो जानेके |